चुप्पी से भी गहरी होती हैं अधूरी बातें
चुप्पी तो बस बाहर दिखती है,
जैसे कोई खाली कमरा
जहाँ खिड़की बंद है,
पर भीतर तूफ़ान गूंज रहा है।
अधूरी बातें
वे दीवारों में रिसते पानी जैसी होती हैं,
जिन्हें कोई देख नहीं पाता,
पर धीरे-धीरे पूरी नींव को खोखला कर देती हैं।
कभी यह बस एक शब्द होता है
जो होंठों तक आया और लौट गया,
कभी एक सवाल
जो आँखों में अटका रह गया।
इन अधूरी बातों में
मोहब्बत भी होती है,
नफ़रत भी,
लालसा भी,
और डर भी।
सबसे गहरी वही होती हैं
जो कह दी जातीं
तो शायद सब आसान हो जाता,
मगर न कह पाने की पीड़ा
हज़ार बार सुनाई देती है
सन्नाटे में,
अकेलेपन में,
यहाँ तक कि हँसी के बीच भी।
कभी लगता है
अधूरी बातें शब्द नहीं,
हमारे भीतर के
छोटे-छोटे ज़ख़्म हैं,
जो भरते नहीं,
बस चुपचाप
और गहरे उतरते जाते हैं।
इसलिए,
चुप्पी तोड़ना आसान है
मगर अधूरी बात को पूरा करना
ज़िंदगी भर का साहस माँगता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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