उसको सोचते हुए
1
जब मैं उसकी आँखें देखता हूँ,
तो दरअसल अपने अंदर की नमी को देखता हूँ।
वो नमी,
जो बरसों से एक नाम पुकारती रही है।
2
उसकी ख़ामोशी सुनना,
जैसे किसी पुराने घर की साँसें सुनना।
जहाँ हर ईंट
कहानी है… और हर दरार, एक राज़।
3
वो मिली तो लगा
समय ने अपनी घड़ी उतार दी हो,
और पलों को
बस उसकी मुस्कान के हवाले कर दिया हो।
4
मैंने उसे नहीं छुआ,
बस उसके होने को छुआ,
और पाया—
ये छुअन हाथ में नहीं, रूह में होती है।
5
जब वो पास होती है,
तो मेरे भीतर के सारे शब्द
ख़ुद-ब-ख़ुद कविता बन जाते हैं,
बिना लिखे… बिना बोले।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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