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Sunday, 22 February 2026

उसको सोचते हुए

उसको सोचते हुए 


1

जब मैं उसकी आँखें देखता हूँ,

तो दरअसल अपने अंदर की नमी को देखता हूँ।

वो नमी,

जो बरसों से एक नाम पुकारती रही है।


2

उसकी ख़ामोशी सुनना,

जैसे किसी पुराने घर की साँसें सुनना।

जहाँ हर ईंट

कहानी है… और हर दरार, एक राज़।


3

वो मिली तो लगा

समय ने अपनी घड़ी उतार दी हो,

और पलों को

बस उसकी मुस्कान के हवाले कर दिया हो।


4

मैंने उसे नहीं छुआ,

बस उसके होने को छुआ,

और पाया—

ये छुअन हाथ में नहीं, रूह में होती है।


5

जब वो पास होती है,

तो मेरे भीतर के सारे शब्द

ख़ुद-ब-ख़ुद कविता बन जाते हैं,

बिना लिखे… बिना बोले।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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