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Sunday, 22 February 2026

एक अधेड़ अकेली औरत की आत्मकथा

 एक अधेड़ अकेली औरत की आत्मकथा


मैं कोई कहानी नहीं हूँ,

न ही किसी उपन्यास का पात्र।

मैं बस एक अधेड़ औरत हूँ—

जिसकी उम्र अब चेहरे की झुर्रियों में नहीं,

अनुभव की परतों में लिखी जाती है।


कभी मैं भी लड़की थी

आँखों में सपनों का उजाला,

चूड़ियों में भविष्य की खनक,

और मन में प्रेम का एक भोला-सा नक्शा।

सोचा था, जीवन एक सीधी रेखा होगा

पढ़ाई, विवाह, बच्चे,

और फिर किसी शांत बरामदे में

ढलती हुई साँझ।


पर जीवन सीधी रेखा नहीं था,

वह वृत्त था

घूमता रहा,

मुझे वहीं लाकर खड़ा कर देता

जहाँ से मैं भागना चाहती थी।


मैंने घर बसाया,

पर घर ने मुझे नहीं बसाया।

रिश्तों की भीड़ में

मैं धीरे-धीरे एक कोना बनती गई—

सजी हुई, व्यवस्थित,

पर अनदेखी।


बच्चे बड़े हुए

उनकी उड़ानों में मेरा आकाश छूटता गया।

पति अपने काम और दुनिया में व्यस्त रहे

और मैं?

मैं रसोई की आँच में

अपने सपनों की रोटियाँ सेंकती रही।


कभी-कभी आईने में खुद को देखती हूँ

यह चेहरा मेरा है,

पर आँखें किसी और की लगती हैं।

इनमें एक स्थिरता है,

जैसे बहुत रो लेने के बाद

आँसू थक गए हों।


अकेलापन कोई अचानक नहीं आता

वह धीरे-धीरे कमरे में प्रवेश करता है,

पहले कुर्सी पर बैठता है,

फिर बिस्तर के किनारे,

और अंततः

दिल के भीतर एक स्थायी निवास बना लेता है।


पर मैं टूटी नहीं हूँ।

मैंने सीखा है

अकेलापन भी एक साधना है।

अब मैं खुद से बात करती हूँ,

खुद को चाय बनाकर देती हूँ,

और अपनी ही हँसी में

एक सुकून ढूँढ लेती हूँ।


मैंने जाना है—

प्रेम हमेशा किसी दूसरे से नहीं होता,

कभी-कभी वह स्वयं से भी करना पड़ता है।


अब मेरी शामें लंबी हैं,

पर भयभीत नहीं।

मैंने अपने भीतर

एक छोटा-सा दीपक जला लिया है—

जो किसी के आने का इंतज़ार नहीं करता,

बस जलता रहता है।


मैं अधेड़ हूँ,

अकेली हूँ,

पर अधूरी नहीं।


मेरी आत्मकथा किसी किताब में नहीं छपेगी,

पर हर उस स्त्री की आँखों में लिखी है

जो भीड़ में रहते हुए भी

खुद से मिलने की राह खोज रही है।


और शायद

यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,, एक अधेड़ अकेली औरत की तरफ से 

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