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Tuesday, 10 March 2026

भाग – 21 : निरर्थकता और कमरे के दर्शन (अल्बेयर कामू के दृष्टिकोण से)

 लघु उपन्यास

भाग – 21 : निरर्थकता और कमरे के दर्शन (अल्बेयर कामू के दृष्टिकोण से)


मैंने खिड़की खोली।

सिगरेट का धुआँ धीरे-धीरे कमरे में फैल रहा था।

रह-रह कर मैं अल्बेयर कामू और उसके “Absurdism” के विचारों में खो रहा था।


कमरा, मेरे चारों ओर मौजूद हर चीज़

झाड़ू, चम्मच, प्लेट, पंखा, कूकर

सभी मुझसे बातचीत कर रहे थे।

झाड़ू कह रही थी,

“देखो, कितने दिनों से सफाई नहीं हुई।

हमने अपना काम किया, पर क्या तुम्हारे जीवन का भी कोई उद्देश्य है?”


पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था,

“तुम सिगरेट पी रहे हो, और मैं हवा बहा रहा हूँ।

हमारा काम लगातार चलता रहता है,

पर क्या यह तुम्हारे जीवन की निरर्थकता को बदल सकता है?”


मैंने सोचा, कामू ने लिखा था कि जीवन की अर्थहीनता को पहचानना ही असली चेतना है।

मेरा कमरा, ये निर्जीव वस्तुएँ, और मकान मालिक

सब इसी अर्थहीन चक्र का हिस्सा हैं।


मकान मालिक की याद आई।

वो बुज़ुर्ग आदमी, जिसने ज़िंदगी भर पैसे जमा किए,

पर अब वृद्धावस्था में वह अपने ही धन के साथ

कुछ भी नहीं कर पा रहा।

वह अपने कमरे के किराए की चिंता भी नहीं करता,

बस कभी-कभी सिगरेट में उड़ाता है और चला जाता है।

कामू कहता है, यही अर्थहीनता है—

मनुष्य मेहनत करता है, कमाता है,

लेकिन समय, उम्र और परिस्थितियाँ उसे हमेशा अप्रयुक्त छोड़ देती हैं।


बाहर मुर्गी वाला अपने मुर्गों को दाना दे रहा था,

दूधवाला बाल्टी में दूध झिलमिला रहा था,

और पान वाला गली में अपने ग्राहकों के लिए इंतजार कर रहा था।

सभी अपने छोटे संसार में व्यस्त हैं,

पर क्या उनका यह कर्म भी वास्तविक उद्देश्य है, या सिर्फ़ अर्थहीनता का खेल?


कमरे में झाड़ू ने धीरे फुसफुसाया,

“तुमने सिगरेट ली, मैंने सफाई की,

लेकिन क्या यह कभी किसी के लिए मायने रखेगा?”

और मैं, कामू की तरह, मुस्कुराया

क्योंकि अर्थहीनता को स्वीकार कर लेना ही स्वतंत्रता है।


सिगरेट का आखिरी कश लेते हुए,

मैंने कमरे की हर चीज़ की ओर देखा।

झाड़ू, चम्मच, प्लेट, पंखा, कूकर,

सब मेरे भीतर दार्शनिक बन गए।

हमारे जीवन का खेल, मकान मालिक की बचत,

और घर के निर्जीव और जीवित तत्व

सब एक अंतरतम संवाद में परिवर्तित हो गए।


फिर मैं चाय की ओर रुख करता हूँ,

गुमटी वाले की तरफ बढ़ते हुए।

मुर्गी वाला, दूधवाला, पान वाला

सब मेरे भीतर कामू के Absurdism का दर्शन छोड़ गए।


और जैसे ही मैं कदम बढ़ाता हूँ,

सत्र और सायमन दा बौआ की यादें

मेरे मन में धीरे-धीरे गूंजने लगती हैं।

कमरा, जीवन, और अर्थहीनता

सब एक साथ नाच रहे हैं,

जैसे कोई सूफियाना संगीत।


— मुकेश

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