होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 15 March 2026

लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी -भाग – 3 - अध्याय 11 : पहली झलक

 लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी -भाग – 3 - अध्याय 11 : पहली झलक

सुबह की पहली रोशनी हमेशा किसी नए आरंभ की तरह लगती है।

रात की लंबी यात्रा के बाद जब ट्रेन धीमी हुई तो खिड़की से आती ठंडी हवा ने अस्तित्व को जगा दिया।

उसने आँखें खोलीं।

आकाश अभी पूरी तरह उजला नहीं हुआ था।

क्षितिज पर हल्की गुलाबी रोशनी फैल रही थी।

सामने की सीट पर साक्षी बैठी थी।

वह पहले से जाग रही थी।

उसकी आँखें खिड़की के बाहर टिकी हुई थीं—जैसे वह किसी ऐसी चीज़ को देख रही हो जिसे शब्दों में बताना कठिन हो।

“हम पहुँचने वाले हैं?” अस्तित्व ने धीरे से पूछा।

साक्षी ने सिर हिलाया।

“अभी कुछ ही देर में।”

ऊपर की बर्थ से नील भी जाग गया।

“इतनी जल्दी?” उसने उनींदी आवाज़ में कहा।

फिर खिड़की से बाहर झाँकते ही उसका चेहरा थोड़ा बदल गया।

“यह जगह सच में अलग लग रही है।”

ट्रेन अब पहाड़ियों के बीच से गुजर रही थी।

दूर-दूर तक फैली हरियाली, बीच-बीच में पत्थरीली ढलानें, और उनके बीच कहीं गहराई में बहती हुई एक चमकती धारा।

अस्तित्व की दृष्टि अचानक उस चमक पर टिक गई।

“क्या वह…?”

साक्षी ने धीरे से कहा

“हाँ।”

कुछ क्षण तक तीनों बिना कुछ कहे देखते रहे।

दूर नीचे घाटी में एक चौड़ी नदी बह रही थी।

सुबह की पहली धूप उसके पानी पर पड़ रही थी और वह हल्के सुनहरे रंग में चमक रही थी।

अस्तित्व के भीतर अचानक एक अजीब-सी अनुभूति उठी।

जैसे वह इस दृश्य को पहली बार नहीं देख रहा।

उसके मन में एक धुंधली-सी स्मृति चमकी

पत्थरों का एक पुराना घाट…

पानी के किनारे खड़ा एक वृक्ष…

और किसी के कदमों की आहट।

उसने तुरंत आँखें बंद कर लीं।

कुछ क्षण बाद जब उसने फिर आँखें खोलीं, नदी अब भी वहीं थी—शांत, विस्तृत, और समय की तरह बहती हुई।

नील ने धीरे से कहा

“मुझे नहीं पता क्यों… लेकिन इस नदी को देखते ही एक अजीब-सी शांति महसूस हो रही है।”

साक्षी मुस्कराई।

“शायद इसलिए कि कुछ जगहें केवल भौगोलिक स्थान नहीं होतीं।”

“तो क्या होती हैं?” नील ने पूछा।

साक्षी ने उत्तर दिया—

“वे स्मृतियों के द्वार होती हैं।”

ट्रेन धीरे-धीरे एक छोटे स्टेशन पर रुक गई।

स्टेशन बहुत बड़ा नहीं था।

कुछ पुराने पेड़, एक छोटा-सा प्लेटफ़ॉर्म, और दूर तक फैली हुई सुबह की धूप।

तीनों ट्रेन से उतर गए।

जमीन पर कदम रखते ही अस्तित्व को लगा जैसे किसी अदृश्य रेखा को पार कर लिया हो।

नील ने चारों ओर देखते हुए कहा

“अब क्या योजना है?”

अस्तित्व ने दूर पहाड़ियों की ओर देखा।

“नदी तक चलेंगे।”

स्टेशन से बाहर निकलते ही एक कच्चा रास्ता नीचे घाटी की ओर जाता था।

रास्ते के दोनों ओर छोटे-छोटे घर थे।

कुछ लोग सुबह की चाय पी रहे थे, कुछ बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे।

जीवन यहाँ धीमी गति से चलता हुआ प्रतीत होता था।

तीनों धीरे-धीरे उस रास्ते पर चलने लगे।

कुछ देर बाद पहाड़ी का मोड़ आया।

और उसी मोड़ पर पहुँचते ही वह दृश्य सामने खुल गया—

नर्मदा।

नदी चौड़ी थी, लेकिन उसका प्रवाह शांत था।

किनारे पर बड़े-बड़े पत्थर थे, और थोड़ी दूरी पर एक पुराना घाट दिखाई दे रहा था।

अस्तित्व अचानक रुक गया।

उसकी आँखें उस घाट पर टिक गईं।

कुछ क्षण तक वह कुछ बोल नहीं सका।

नील ने पूछा

“क्या हुआ?”

अस्तित्व ने धीमे स्वर में कहा—

“मैं… इस जगह को पहचानता हूँ।”

साक्षी ने उसकी ओर देखा।

“पहचानते हो?”

अस्तित्व ने धीरे-धीरे सिर हिलाया।

“सपने में…

मैंने यही घाट देखा था।”

साक्षी ने उस घाट को ध्यान से देखा।

वह वही दृश्य था—

पुराने पत्थरों की सीढ़ियाँ,

किनारे पर खड़ा एक बड़ा पीपल का वृक्ष,

और नदी का शांत प्रवाह।

नील ने आश्चर्य से कहा—

“यह सच में वैसा ही है जैसा तुमने बताया था।”

अस्तित्व कुछ क्षण तक उस दृश्य को देखता रहा।

फिर उसने धीमे स्वर में कहा—

“पर एक चीज़ अभी भी अधूरी है।”

“क्या?” नील ने पूछा।

अस्तित्व ने घाट की ओर देखते हुए उत्तर दिया—

“सपने में…

इस घाट पर कोई और भी था।”

साक्षी ने धीरे से पूछा

“कौन?”

अस्तित्व ने आँखें थोड़ी संकरी करते हुए उस स्थान को देखने की कोशिश की—

जैसे वह किसी धुंधली स्मृति को स्पष्ट करना चाहता हो।

और उसी क्षण…

घाट की सीढ़ियों पर एक आकृति दिखाई दी।

कोई व्यक्ति धीरे-धीरे नीचे उतर रहा था।

तीनों कुछ क्षण तक उसे देखते रहे।

सूरज अब थोड़ा ऊपर आ चुका था।

रोशनी उस व्यक्ति के चेहरे पर पड़ी—

और अस्तित्व के मन में अचानक एक झटका-सा लगा।

उसे लगा

जैसे यह दृश्य भी

वह पहले देख चुका है।

पर इस बार सपना नहीं था।

यह वास्तविक था।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment