लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी - भाग – 3 -अध्याय 12 : घाट पर खड़ा व्यक्ति
कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जिनमें समय अचानक धीमा पड़ जाता है।
घाट की सीढ़ियों पर उतरता हुआ वह व्यक्ति ठीक वैसा ही दृश्य था।
नदी शांत थी।
सुबह की धूप अब पानी पर फैल चुकी थी।
और पत्थर की पुरानी सीढ़ियों के बीच से वह आकृति धीरे-धीरे नीचे उतर रही थी।
अस्तित्व की आँखें उसी पर टिकी थीं।
उसे अचानक अपने सपने का एक और हिस्सा याद आया—
नदी का वही किनारा,
वही पीपल का वृक्ष,
और सीढ़ियों पर उतरता हुआ कोई व्यक्ति।
लेकिन सपने में चेहरा स्पष्ट नहीं था।
यहाँ चेहरा धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा था।
नील ने धीमे स्वर में पूछा
“क्या वही है?”
अस्तित्व ने उत्तर नहीं दिया।
साक्षी ने उस व्यक्ति को ध्यान से देखा।
वह लगभग पचास-पचपन वर्ष का लगता था।
लंबा कद।
हल्की दाढ़ी।
और आँखों में वह स्थिरता जो अक्सर बहुत दूर तक यात्रा करने वाले लोगों में होती है।
वह नीचे जाकर नदी के किनारे रुका।
कुछ क्षण उसने पानी को देखा।
फिर उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर ऊपर की ओर देखा—
ठीक उसी दिशा में
जहाँ अस्तित्व, साक्षी और नील खड़े थे।
उनकी आँखें एक पल के लिए मिलीं।
उस क्षण अस्तित्व को लगा
जैसे वह व्यक्ति उन्हें देखकर चौंका नहीं।
जैसे वह पहले से जानता था कि वे यहाँ आएँगे।
“चलें?” साक्षी ने धीरे से कहा।
अस्तित्व ने सिर हिलाया।
तीनों धीरे-धीरे घाट की ओर बढ़ने लगे।
पत्थर की सीढ़ियाँ समय के साथ घिस चुकी थीं।
कई जगहों पर उन पर काई जमी थी।
जब वे नीचे पहुँचे तो वह व्यक्ति अब भी वहीं खड़ा था।
नदी का पानी उसके पैरों को हल्के से छू रहा था।
अस्तित्व कुछ क्षण उसके सामने खड़ा रहा।
फिर उसने पूछा
“क्या आप यहाँ अक्सर आते हैं?”
उस व्यक्ति ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“कभी-कभी।”
उसकी आवाज़ शांत थी।
जैसे उसमें कोई जल्दी न हो।
नील ने उत्सुकता से पूछा
“क्या यह घाट बहुत पुराना है?”
उस व्यक्ति ने नदी की ओर देखते हुए कहा
“इतना पुराना कि यहाँ आने वाले लोग अक्सर भूल जाते हैं
कि वे पहली बार आए हैं…
या पहले भी आ चुके हैं।”
अस्तित्व के भीतर जैसे कोई तार छू गया।
“आपका मतलब?” उसने पूछा।
उस व्यक्ति ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में एक गहरी जिज्ञासा थी—जैसे वह अस्तित्व को पढ़ने की कोशिश कर रहा हो।
“तुमने यह जगह पहले भी देखी है।”
यह प्रश्न नहीं था।
एक कथन था।
अस्तित्व कुछ क्षण चुप रहा।
फिर उसने धीरे से कहा
“सपने में।”
वह व्यक्ति मुस्कराया।
“अच्छा।”
नील ने हल्के आश्चर्य से कहा—
“आपको यह कैसे पता?”
उस व्यक्ति ने उत्तर देने से पहले कुछ क्षण नदी की ओर देखा।
“क्योंकि इस नदी के किनारे आने वाले कई लोग ऐसा ही कहते हैं।”
फिर उसने अस्तित्व से पूछा
“तुमने अपने सपने में क्या देखा था?”
अस्तित्व ने कुछ क्षण सोचा।
फिर उसने कहा
“यही घाट…
यही वृक्ष…
और कोई व्यक्ति जो सीढ़ियों से उतर रहा था।”
वह व्यक्ति शांत रहा।
फिर उसने धीरे से पूछा
“और क्या देखा था?”
अस्तित्व ने आँखें बंद कर लीं।
सपने की धुंधली छवि फिर से उभरने लगी—
पानी की आवाज़…
पत्थरों की ठंडक…
और किसी के शब्द।
उसने धीरे-धीरे कहा
“जैसे कोई मुझसे कुछ कहने वाला था…
लेकिन मैं जाग गया।”
कुछ क्षण तक घाट पर केवल नदी की धारा की आवाज़ सुनाई देती रही।
फिर वह व्यक्ति हल्के से मुस्कराया।
“तो शायद इस बार तुम्हें जागना नहीं चाहिए।”
नील ने तुरंत पूछा
“आप कहना क्या चाहते हैं?”
उस व्यक्ति ने सीधे उत्तर नहीं दिया।
वह धीरे-धीरे घाट की एक सीढ़ी पर बैठ गया।
फिर उसने कहा
“इस नदी के बारे में एक पुरानी बात कही जाती है।”
साक्षी ध्यान से सुन रही थी।
“क्या?” उसने पूछा।
वह व्यक्ति बोला
“यह नदी केवल पानी नहीं बहाती…
यह स्मृतियाँ भी बहाती है।”
नील हल्के से हँसा।
“यह तो बहुत काव्यात्मक बात है।”
वह व्यक्ति भी मुस्कराया।
“शायद।”
फिर उसने अस्तित्व की ओर देखते हुए कहा—
“लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कोई व्यक्ति यहाँ आता है…
और उसे लगता है कि वह किसी अधूरी बात को पूरा करने आया है।”
अस्तित्व के भीतर अचानक एक हल्की बेचैनी उठी।
“किस बात को?” उसने पूछा।
वह व्यक्ति कुछ क्षण चुप रहा।
फिर उसने धीरे से कहा
“यह तो वही व्यक्ति जान सकता है।”
साक्षी अब तक शांत थी।
पर इस बार उसने पूछा
“क्या आप हमें जानते हैं?”
वह व्यक्ति मुस्कराया।
“नहीं।”
फिर उसने जोड़ा
“लेकिन यह संभव है कि यह जगह तुम्हें जानती हो।”
नील ने धीरे से कहा
“अब यह रहस्य थोड़ा ज़्यादा हो रहा है।”
अस्तित्व अभी भी उस व्यक्ति को देख रहा था।
उसके मन में एक अजीब-सी अनुभूति थी
जैसे वह व्यक्ति पूरी तरह अपरिचित भी नहीं है।
फिर अस्तित्व ने पूछा
“आपका नाम क्या है?”
वह व्यक्ति कुछ क्षण शांत रहा।
फिर उसने उत्तर दिया
“नाम से क्या फर्क पड़ता है?”
नील ने तुरंत कहा
“फिर भी।”
वह व्यक्ति हल्का-सा मुस्कराया।
“लोग मुझे यहाँ ‘प्रवासी’ कहते हैं।”
अस्तित्व ने धीरे से दोहराया
“प्रवासी…”
वह व्यक्ति उठ खड़ा हुआ।
फिर उसने कहा
“अगर तुम्हें सच में यह जानना है कि तुम यहाँ क्यों आए हो…
तो आज शाम फिर इस घाट पर आना।”
नील ने पूछा
“क्यों?”
प्रवासी ने नदी की ओर देखते हुए कहा
“क्योंकि इस नदी की कुछ बातें
केवल शाम को समझ में आती हैं।”
यह कहकर वह धीरे-धीरे घाट की सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने लगा।
कुछ ही क्षणों में वह वृक्षों के पीछे ओझल हो गया।
घाट पर अब फिर वही निस्तब्धता थी।
नदी बह रही थी।
सूरज ऊपर चढ़ चुका था।
नील ने गहरी साँस ली।
“मुझे लगता है कि हमारी यात्रा अब सच में शुरू हुई है।”
अस्तित्व अभी भी उसी दिशा में देख रहा था जहाँ वह व्यक्ति गया था।
साक्षी ने धीरे से पूछा
“तुम क्या सोच रहे हो?”
अस्तित्व ने धीमे स्वर में कहा—
“सपने में…
जिस व्यक्ति को मैंने देखा था…”
वह कुछ क्षण रुका।
फिर उसने कहा
“वह शायद यही था।”
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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