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Tuesday, 10 March 2026

भाग – 8 : खिचड़ी, बर्तन और मकान-मालिक की पत्नी

 लघु उपन्यास

भाग – 8 : खिचड़ी, बर्तन और मकान-मालिक की पत्नी


दो दिनों से

बाहर ही खाना खाया है।


बाहर ही चाय।


गली के मोड़ पर

गुमटी वाले के यहाँ

चाय और समोसे से

उदर-पूर्ति करता रहा हूँ।


एक शाम तो

उसने छोटे चावल भी खिला दिए थे

कहकर

“भाई जी, आज यही बन पाया है।”


आज

घर का राशन भी

और आलस भी

एक ही सलाह दे रहे हैं


खिचड़ी।


मैं उठता हूँ।


सिंक की तरफ़ देखता हूँ।


सारे बर्तन

धुलने की प्रतीक्षा में खड़े हैं

जैसे किसी पुराने दरबार में

अपनी बारी का इंतज़ार करते लोग।


मुझे सिंक के पास देख कर

उनके चेहरों पर

उम्मीद की चमक आ जाती है।


चम्मच

खुशी से मुस्कुराना चाहता है


पर हलवे की सूखी चाशनी

उसकी मुस्कान को

ढँक लेती है।


चाय का बर्तन

दीवार से चिपकी पत्तियों के साथ

कुछ फुसफुसा रहा है


शायद कह रहा हो


“भाई जी,

अब तो मुझे साफ़ कर लो।

ये पत्तियाँ

बदन पर सूख कर

खुजली पैदा करने लगी हैं।”


प्लेट

बर्तनों के बीच से

मुँह निकालकर

एक झूठी-सी मुस्कान

मेरी तरफ़ फेंकती है।


मैं अपने कुर्ते की

बाज़ू मोड़ता हूँ।


बर्तन माँजने वाला

पुराना स्पंज उठाता हूँ।


कई दिनों से

इस्तेमाल न होने के कारण

वह थोड़ा ऐंठ गया है

शायद रूठा हुआ।


मैं उसे पानी में भिगोता हूँ।


वह धीरे-धीरे नरम पड़ता है।


जैसे कह रहा हो

“चलो, अब काम शुरू करें।”


अब

सारे बर्तन

अपनी-अपनी बारी का

इंतज़ार कर रहे हैं।


सिंक में

पानी की आवाज़

धीरे-धीरे

रसोई की खामोशी को भर देती है।


फिर

किचन का प्लेटफ़ॉर्म भी

मनुहार करने लगता है।


गैस स्टोव

हल्की-सी खाँसी लेकर

जैसे कहता है


“आज मुझे भी याद कर लो।”


खैर…


बर्तन

धुल-पोंछ कर

खुश हो गए हैं।


रसोई

हल्की-हल्की

खिलखिलाने लगी है।


मैं चावल और दाल

एक साथ धोकर

कुकर में डाल देता हूँ।


खिचड़ी का

अदहन चढ़ जाता है।


मैं फिर

अपने बिस्तर पर आकर बैठ जाता हूँ।


तभी

अचानक याद आता है


आज रास्ते में

मकान-मालिक मिला था।


उसकी वही

सूखी-सी हँसी।


जिसमें उसने

मेरी सिगरेट का कश

उड़ा दिया था।


और मैं


अपने हिस्से की

एक सिगरेट की कीमत में

किराया न पूछे जाने से

अंदर ही अंदर

खुश हो गया था।


पर उस हँसी में

कुछ और भी था।


एक थकान।


एक खालीपन।


कहते हैं

उसकी पत्नी

बहुत चुप रहने वाली औरत थी।


रसोई में

धीरे-धीरे काम करती थी।


किसी को

कभी पता नहीं चलता था

कि कब उसने खाना बना दिया।


मकान-मालिक

जब शाम को लौटता था

तो वह पूछती


“चाय अभी बनाऊँ

या थोड़ी देर बाद?”


इतना-सा सवाल

जैसे

एक घर की धड़कन हो।


पिछले साल

जब वह चली गई

तो कई दिनों तक

उस घर की रसोई नहीं खुली।


लोग कहते हैं

मकान-मालिक

कभी-कभी

रसोई के दरवाज़े पर खड़ा रहता था


जैसे उसे यकीन न हो

कि अंदर

अब कोई नहीं है।


फिर

धीरे-धीरे

उसने चाय बनाना सीख लिया।


पर चाय

ज्यादातर

ठंडी हो जाती है।


शायद

क्योंकि

अब कोई पूछने वाला नहीं


“चीनी कितनी?”


मैं लेटे-लेटे

यह सब सोच ही रहा हूँ


कि अचानक


कुकर की पहली सीटी

तेज़ आवाज़ में बजती है।


रसोई

भाप से भर जाती है।


और खिचड़ी

अपनी

सादी-सी खुशबू के साथ


घर में

धीरे-धीरे

फैलने लगती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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