न्याय दर्शन : तर्क की अग्नि पर एक शोधात्मक नज़्म
जब संशय पहली बार जन्मा,
वह अज्ञान का अंधेरा नहीं था—
वह प्रश्न की पहली ज्योति था।
उस ज्योति को दिशा दी
गौतम ने,
जिन्होंने सूत्रों में बाँध दिया
सोचने का अनुशासन।
न्याय कहता है—
सत्य सहज नहीं,
सत्य सिद्ध करना पड़ता है।
प्रमाण के चार द्वार हैं—
प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द।
इन्हीं से खुलती है
ज्ञान की सभा।
प्रत्यक्ष—
जब इंद्रियाँ साक्षी हों।
अनुमान—
जब धुएँ से अग्नि का बोध हो।
उपमान—
जब तुलना से अर्थ जागे।
शब्द—
जब विश्वसनीय वाणी
ज्ञान का सेतु बने।
यह नज़्म शोध बन जाती है—
न्याय का अनुमान
सिर्फ़ कल्पना नहीं,
पाँच अवयवों का संयम है—
प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन।
तर्क यहाँ
उत्साह नहीं,
विन्यास है।
जब पश्चिम में
अरस्तू
सिलोज़िज़्म रच रहे थे,
यहाँ न्याय
हेतु और उदाहरण के साथ
वाक्य को प्रमाणित कर रहा था।
समानांतर यात्राएँ—
दो भूगोल,
एक जिज्ञासा।
न्याय का “हेत्वाभास”
चेतावनी है—
हर कारण, कारण नहीं होता।
भ्रम भी तर्क का वेश पहन लेता है।
आज की प्रयोगशालाओं में
जब वैज्ञानिक
परिकल्पना गढ़ते हैं,
डेटा से उसे जाँचते हैं,
और निष्कर्ष लिखते हैं—
क्या वह न्याय की
आधुनिक प्रतिध्वनि नहीं?
संशय → प्रयोजन → दृष्टांत → सिद्धांत—
यह क्रम
मानो शोध-पत्र की संरचना है।
न्याय कहता है—
विवाद नहीं,
विवेक आवश्यक है।
वाद, जल्प, वितंडा—
तीनों में अंतर पहचानो।
सत्य-प्राप्ति ही उद्देश्य हो,
विजय नहीं।
और मैं सोचता हूँ—
यदि समाज
न्याय के इन सूत्रों को
जीवन में उतार ले,
तो संवाद
संघर्ष नहीं होगा।
न्याय दर्शन
सूखा तर्क नहीं,
विवेक का साधन है।
यह सिखाता है—
विश्वास करो,
पर प्रमाण से।
सवाल करो,
पर मर्यादा से।
शोध की यह नज़्म
निष्कर्ष में नहीं,
प्रक्रिया में विश्वास करती है।
क्योंकि न्याय के अनुसार—
ज्ञान मुक्ति का साधन है,
और मुक्ति
अंधविश्वास से नहीं,
सत्य के अनुशासित अन्वेषण से मिलती है।
तर्क की यह अग्नि
आज भी जल रही है—
हर प्रयोगशाला में,
हर शास्त्रार्थ में,
हर ईमानदार प्रश्न में।
और शायद
हर उस मन में
जो प्रमाण के बिना
संतुष्ट नहीं होता।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment