“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
जब भी आईना देखूँ तेरा अक्स दिखे,
मेरी तन्हाई में तेरी धड़कन सिमटके,
मैं दुनिया से लड़ लूँगा मुस्कुराकर,
तू बस मेरे यक़ीन में बसी रहके।
मुकेश
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