ख़ामोशी की ज़ुबान
कभी-कभी प्रेम
कोई शब्द नहीं चुनता,
वह बस
आँखों के रास्ते
दिल तक उतर आता है।
जैसे शाम की हल्की हवा
चुपचाप खिड़की से गुज़र जाए,
और परदों की धीमी सरसराहट में
कोई मीठा-सा राज़
ठहर जाए।
तुम जब सामने होते हो
तो लफ़्ज़ अक्सर
मेरे होंठों तक आकर रुक जाते हैं,
और तुम्हारी आँखों की चमक
मेरी सारी बात
बिना कहे सुन लेती है।
तुम्हारी मुस्कान—
वह बहुत छोटी-सी होती है,
बस होंठों पर
एक हल्की-सी रेखा भर,
मगर उसी में
पूरी मोहब्बत की कहानी
छुपी रहती है।
कभी तुम्हारी पलकें झुकती हैं
तो लगता है
जैसे कोई शर्मीली धूप
धरती को छूकर
धीरे-धीरे लौट गई हो।
और जब नज़रें मिलती हैं
तो एक पल में
इतनी बातें हो जाती हैं
कि सदियों की किताबें भी
उन्हें लिख न सकें।
प्रेम शायद यही है—
जहाँ आवाज़ की ज़रूरत नहीं होती,
जहाँ दिल
आँखों की भाषा पढ़ लेते हैं।
जहाँ एक हल्की-सी मुस्कान
रात भर
यादों की तरह चमकती रहती है,
और कोई ख़ामोशी
दिल में
दीपक बनकर जलती रहती है।
कभी-कभी सोचता हूँ—
अगर प्रेम बोलने लगे
तो शायद उसकी ख़ूबसूरती
थोड़ी कम हो जाए,
क्योंकि उसकी असली चमक
तो उसी अनकहेपन में है।
इसलिए
जब भी तुम मुस्कुरा देते हो
और आँखों में
वह चंचल-सी रोशनी उतर आती है—
मैं समझ जाता हूँ
कि प्रेम फिर से
चुपचाप
अपनी भाषा बोल गया है।
मुकेश्,,,
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