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Sunday, 29 March 2026

एक अधूरा चक्र, जो पूरा होना नहीं चाहता”

 एक अधूरा चक्र, जो पूरा होना नहीं चाहता”

यह चक्र

किसी ज्यामिति का नहीं,

किसी रेखा का भी नहीं,

यह बना है

उन यात्राओं से

जो कभी पूरी नहीं हुईं।


यह घूमता है—

पर पूरा नहीं होता,

जैसे किसी ने

उसकी परिधि से

एक बिंदु चुरा लिया हो।


लोग कहते हैं—

“हर चक्र का एक अंत होता है,”

पर यह—

उस नियम से

इनकार करता है।


यह आधा नहीं,

अधूरा है

और अधूरापन

इसकी कमी नहीं,

इसका स्वभाव है।


मैंने इसे कई बार

पूरा करने की कोशिश की—


हर बार

एक नया प्रयास,

एक नई शुरुआत,

एक नई उम्मीद—


पर हर बार

वही बिंदु

मुझसे छूट जाता है,


जैसे वह बिंदु

कभी था ही नहीं,

या शायद

मैं ही उसे पकड़ने के योग्य नहीं था।


धीरे-धीरे

मुझे समझ आया


यह चक्र

पूरा होना ही नहीं चाहता,


क्योंकि

पूरा होते ही

यह समाप्त हो जाएगा।


और इसका अस्तित्व

इसके अधूरेपन में ही है।


यह वही है—

जिसे हम जीवन कहते हैं,

जहाँ हर उपलब्धि के बाद

एक नई इच्छा जन्म लेती है,


और हर अंत के बाद

एक नया प्रारंभ।


यह चक्र

न रुकता है,

न थकता है


बस

खुद को दोहराता है,

नए रूपों में,

नए नामों से।


मैंने देखा—

कि मैं भी

इस चक्र का हिस्सा हूँ,


मैं ही

उसकी गति हूँ,

और मैं ही

उसका अधूरापन।


जब मैं

कुछ पाने के पीछे भागता हूँ,

चक्र तेज़ हो जाता है,


और जब मैं

रुकता हूँ,

वह भी

धीमा पड़ जाता है।


पर वह रुकता नहीं

क्योंकि उसका उद्देश्य

रुकना नहीं,

चलते रहना है।


एक दिन

मैंने उससे पूछा—


“तू पूरा क्यों नहीं होता?”


उसने कोई उत्तर नहीं दिया,

बस

मुझे एक दर्पण दिखा दिया।


उस दर्पण में

मैं ही था

अधूरा,

खोज में,

एक ऐसे अंत की तलाश में

जो कभी नहीं आएगा।


और तभी

मुझे समझ आया

चक्र अधूरा नहीं है,

मैं अधूरा हूँ,


और मेरी ही अधूरी समझ

उसे अधूरा बना देती है।


जैसे ही

मैंने इस खोज को

छोड़ना शुरू किया,


चक्र ने

अपनी गति बदल दी


वह अब भी घूम रहा था,

पर उसमें

कोई बेचैनी नहीं थी।


वह पूरा नहीं हुआ,

पर अब

उसका अधूरापन

मुझे चुभता नहीं था।


शायद यही

उसका रहस्य है,


कि वह पूरा होने के लिए नहीं,

समझे जाने के लिए है।


और जब हम

उसे समझ लेते हैं,


तो वह

पूरा हो या न हो


हम

पूर्ण हो जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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