होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Tuesday, 17 March 2026

मेरी साँसों में अटकी तुम

 मेरी साँसों में अटकी तुम


तुम गई तो

दरवाज़ा बस

हल्के से बंद हुआ,

पर कमरे में

कुछ रह गया था।


हवा में

तुम्हारी खुशबू की

एक महीन-सी लकीर

जैसे कोई याद

धीरे-धीरे तैर रही हो।


मैंने गहरी साँस ली

और लगा

तुम कहीं बाहर नहीं,

यहीं

मेरी साँसों में

अटकी हुई हो।


अब जब भी

हवा का कोई झोंका आता है,

मैं चुपके से

एक और साँस ले लेता हूँ

शायद

तुम फिर से

थोड़ी-सी

मेरे भीतर उतर आओ।


मुकेश ,

No comments:

Post a Comment