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Wednesday, 18 March 2026

कई बार प्रेम नहीं लौटता,

 सच है

कई बार प्रेम नहीं लौटता,

जैसे आवाज़

बीहड़ों में गूँजकर

खुद ही खो जाती है।


कई बार

हम जिसे पुकारते हैं,

वो नाम

हवा के साथ बह जाता है

और हाथ में

सिर्फ़ एक अधूरी-सी खामोशी रह जाती है।


प्रेम हमेशा

मंज़िल तक पहुँचे,

यह ज़रूरी नहीं होता

कभी-कभी वो

रास्ते में ही थककर

किसी मोड़ पर बैठ जाता है,

और फिर

वापस मुड़कर नहीं आता।


पर जो नहीं लौटता,

वो भी कहीं खत्म नहीं होता

वो बदल जाता है

याद में,

एक आदत में,

या फिर

एक ऐसी ख़ामोश ताक़त में

जो हमें अंदर से थोड़ा और गहरा बना देती है।


कई बार

प्रेम का न लौटना ही

उसकी आख़िरी सच्चाई होता है

क्योंकि हर कहानी का अंत

मिलन नहीं,

समझ भी हो सकता है।


मुकेश ,,,,

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