पंखुड़ियों की तरह खुलती तुम
सुबह की हल्की हवा में
डहलिया धीरे-धीरे खिल रहे थे
हर पंखुड़ी अपने रंग में
एक नई कहानी कह रही थी।
और तुम
पंखुड़ियों की तरह खुलती हो,
धीरे-धीरे,
पहले आँखों में,
फिर होठों पर,
फिर दिल की गहराई में।
तुम्हारी मुस्कान
जैसे सूरज की किरणें
हर परत को छूती हुई
अधूरी बातें पूरी कर देती है।
तुम्हारी चुप्पी
फूलों की नर्म छाया सी,
तुम्हारा हँसना
हवा में बहते रंगों सा,
और तुम्हारी बातें
जैसे मिट्टी की ख़ुशबू
जो हर दिल को छू लेती है।
मैं देखता रह जाता हूँ,
कि जैसे डहलिया की पंखुड़ियाँ
एक-एक कर खुलती हैं,
वैसे ही तुम
धीरे-धीरे
अपने रंग, अपनी गहराई
और अपनी पूरी रूह
मुझ पर प्रकट करती हो
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment