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Tuesday, 24 March 2026

तुम्हारा होना, एक अधूरा उजाला

 तुम्हारा होना, एक अधूरा उजाला


तुम्हारा होना

जैसे सांझ की उस अंतिम रेखा पर ठहरा हुआ प्रकाश,

जो न पूर्ण दिन है,

न पूर्ण रात्रि,

बस एक अनिश्चित-सा ठहराव,

जिसमें मन बार-बार लौट जाना चाहता है।


तुम आई थीं

जैसे किसी थके हुए क्षितिज पर

धीमे से उतरती हुई धूप,

और चली भी गईं

उसी सहजता से,

जैसे उजाला कभी बताकर नहीं जाता।


तुम्हारी आँखों में

एक आधा-सा सत्य था,

जिसे समझने की कोशिश में

मैंने अपने ही भीतर

कितनी ही रातें जला दीं।


तुम्हारा स्पर्श—

न पूरी ऊष्मा,

न पूर्ण शीतलता,

बस एक ऐसी स्मृति

जो हर बार छूकर भी

पूरी नहीं होती।


तुम थीं

पर जैसे अपने ही भीतर कहीं खोई हुई,

और मैं

तुम्हें पाते-पाते

खुद से दूर होता चला गया।


यह कैसा उजाला है तुम्हारा,

जो अंधेरे को भी पूरी तरह आने नहीं देता,

और प्रकाश को भी

कभी सम्पूर्ण नहीं होने देता।


अब जब तुम नहीं हो,

तब भी

तुम्हारा वह अधूरा उजाला

मेरे भीतर

कहीं जलता रहता है—


जैसे कोई दीपक

जिसे बुझना भी आता है,

पर जो हर बार

आधे में ही ठहर जाता है।


मुकेश ,,,

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