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Monday, 9 March 2026

खाँसती हुई बूढ़ी औरत

 खाँसती हुई बूढ़ी औरत


गली के उस मोड़ पर

एक बूढ़ी औरत

धीरे-धीरे चल रही है।


उसकी खाँसी

बार-बार

उसकी साँसों को रोक लेती है,

जैसे कोई पुराना दरवाज़ा

हवा में अटक-अटक कर खुल रहा हो।


उसकी पीठ

थोड़ी झुक गई है,

और कदम

अब पहले जैसे नहीं रहे

हर कदम

मानो समय से

थोड़ा-सा सहारा माँगता है।


उसकी आँखों में

अब भी

किसी पुराने आँगन की धूप है,

जहाँ कभी

उसकी हँसी

दीवारों से टकराकर लौटती थी।


खाँसी के बीच

वो कभी-कभी

रुक जाती है,

दीवार का सहारा लेती है

जैसे ज़िंदगी की लंबी राह

अब थोड़ी भारी हो गई हो।


रास्ते से गुज़रते लोग

उसे बस

एक बूढ़ी औरत समझते हैं,

पर उसके भीतर

पूरा एक जीवन है—


अनगिनत सुबहें,

अनगिनत रोटियाँ,

अनगिनत दुआएँ

और अनगिनत इंतज़ार।


उसकी खाँसी

सिर्फ़ बीमारी नहीं—

वो समय की वह आवाज़ है

जो धीरे-धीरे

शरीर से होकर

जीवन की कहानी

बाहर निकालती रहती है।


और उस बूढ़ी औरत की तरह

एक दिन

हम सब भी

अपनी साँसों में

समय की वही

धीमी खाँसी

महसूस करेंगे।


मुकेश ,,,,,,,,,,,


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