जब दिन अपने नाम भूल गए
एक सुबह
कैलेंडर ने
अपनी आवाज़ खो दी
और दिन
अपने-अपने नाम भूल गए।
सोमवार
अब कोई बोझ नहीं रहा,
शुक्रवार
कोई राहत नहीं लाया
सब दिन
एक-सी चुप्पी में
खुद को टटोलते रहे।
घड़ियाँ चलती रहीं,
पर उन्हें
किसी दिशा का ज्ञान नहीं था
जैसे रास्ते हों
पर मंज़िलें
कहीं और चली गई हों।
लोग उठे
पर किसी जल्दी में नहीं,
काम हुए
पर किसी हड़बड़ी में नहीं
जैसे समय ने
अपनी पकड़
ढीली कर दी हो।
एक बच्चा
पूछता रहा
“आज कौन-सा दिन है?”
और किसी के पास
कोई जवाब नहीं था।
एक बूढ़ा
मुस्कुराया
“शायद वही,
जिसे हम
कभी जीना भूल गए थे।”
दिन
अब सिर्फ़ उजाले थे,
और रातें
सिर्फ़ अँधेरे
उनके बीच
कोई नाम नहीं,
कोई हिसाब नहीं।
शिकायतें
धीरे-धीरे
घुलने लगीं,
और रिश्ते
अपने असली आकार में
लौटने लगे।
जब दिन
अपने नाम भूल गए
तो हमने जाना,
कि नामों के बिना भी
वक़्त
बहुत सुंदर हो सकता है।
और तब से
कभी-कभी
हम भी
अपने नाम,
अपनी तारीख़ें,
थोड़ी देर के लिए
भूल जाते हैं
ताकि
थोड़ा-सा
ज़्यादा जी सकें।
मुकेश ,,
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