रिहाई का सूफ़ियाना राज़
किसी को थामे रखना
इश्क़ का उसूल नहीं होता
इश्क़ तो हवा की तरह होता है,
जिसे मुट्ठी में क़ैद करो
तो वह दम तोड़ देता है।
रूहें
जंजीरों से नहीं बंधतीं,
वे तो ख़ामोश दरियाओं की तरह
अपने रास्ते ख़ुद चुनती हैं।
जो तुम्हारे हिस्से की रौशनी है
वो लौट-लौट कर आएगी,
भले ही तुम उसे
रोकने की कोशिश न करो।
और जो तुम्हारी क़िस्मत का सफ़र नहीं—
वो तुम्हारी उँगलियों से
रेत की तरह फिसल जाएगा,
चाहे तुम
कितनी ही मज़बूती से
उसे थाम लो।
सूफ़ियों ने कहा है
मोहब्बत का असली इम्तिहान
किसी को पकड़ लेने में नहीं,
बल्कि
उसकी रिहाई में छुपा होता है।
जब दिल इतना बालिग़ हो जाए
कि वो कह सके—
“अगर तुम रहना चाहो
तो मेरी ख़ामोशी में भी ठहर जाओ,
और अगर जाना चाहो
तो मेरी दुआओं के साथ चले जाओ।”
तभी रूह समझती है
बे-नियाज़ी का वह नूरानी राज़
कि सच्चे रिश्ते
क़ैद से नहीं बनते,
वे तो आज़ादी की खुली हवा में
ख़ुद ही जड़ पकड़ लेते हैं।
मुकेश ,,,,,,,
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