तुम्हारी आँखों में प्रमाण
बहुत दिनों तक
मैंने प्रेम को
संदेह की मेज़ पर रखा—
हर भावना से पूछा,
तुम्हारा प्रमाण क्या है?
तर्क की रोशनी में
मैंने हर धड़कन को परखा,
हर स्मृति से कहा—
अपने होने का कारण बताओ।
शब्द आए,
दलीलें आईं,
पर कोई भी
इतना गहरा नहीं था
कि मन को मना सके।
तब एक दिन
मैंने तुम्हारी आँखों में देखा—
और अचानक
सारे प्रश्न
धीरे-धीरे शांत होने लगे।
उन आँखों में
कोई तर्क नहीं था,
कोई सिद्धांत नहीं,
पर एक अजीब-सी सच्चाई थी—
जैसे पानी
अपने होने का प्रमाण
खुद ही दे देता है।
तुम्हारी आँखें
किसी प्राचीन शास्त्र की तरह थीं,
जिन्हें पढ़ने के लिए
व्याख्या की ज़रूरत नहीं होती।
तब समझ आया—
हर सत्य
शब्दों से सिद्ध नहीं होता।
कुछ सत्य
बस देखे जाते हैं,
और देखने भर से
मन मान लेता है।
अब जब भी
कोई पूछता है
कि प्रेम का प्रमाण क्या है—
मैं मुस्कुरा कर कहता हूँ,
किसी दिन
तुम्हारी आँखों में देख लेना,
वहाँ
एक ऐसा उत्तर है
जिसे किसी तर्क की
ज़रूरत नहीं पड़ती।
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