साये से लंबी होती हुई तन्हाई
धीरे-धीरे मेरे पास आ बैठती है,
जैसे शाम
दिन के कंधों पर हाथ रखकर
चुपचाप उतर आती हो।
पहले वह छोटी थी
पाँवों के आसपास
सिकुड़ी हुई-सी,
पर समय की ढलती धूप में
वह फैलती गई
और अब
मेरे साये से भी आगे निकल गई है।
लोगों की आवाज़ें
आती-जाती रहती हैं,
पर भीतर
एक सूना कमरा है
जहाँ कोई कदम
ठहरता नहीं।
मैंने कई बार
रोशनी बढ़ाकर देखा
सोचा
तन्हाई छोटी हो जाएगी,
पर सच यह है
कि जितनी तेज़ रोशनी होती है
साया उतना ही लंबा हो जाता है।
तब समझ में आया
तन्हाई
किसी की गैरहाज़िरी नहीं,
बल्कि
अपने भीतर
बहुत देर तक
अकेले रहने की आदत है।
और एक दिन
वही तन्हाई
धीरे से बताती है
कि आदमी
जब सबके साथ होकर भी
अकेला रहना सीख ले,
तभी
वह अपने सबसे सच्चे
साथी से मिलता है
ख़ुद से
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,
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