तुम्हें सोचते हुए
जब
कभी तुम्हें सोचता हूँ,
तो यूँ लगता है
जैसे कोई इबादत
अपने आप हो रही हो।
तुम
कोई शख़्स नहीं लगती,
एक एहसास लगती हो
जो छूता नहीं,
फिर भी
हर जगह मौजूद रहता है।
तुम्हारी आँखें
जैसे किसी शांत झील पर
ठहरी हुई सुबह,
और होंठ
जैसे अधखिली दुआ
जो बस कहे जाने की प्रतीक्षा में हो।
तुम्हारा चेहरा…
कोई सूरत नहीं,
एक ठहराव है—
जहाँ दिल
थककर भी
रुकना चाहता है।
तुम्हें देखना
जैसे इश्क़ करना नहीं,
इश्क़ में उतरना है—
धीरे-धीरे,
बिना शोर,
बिना वजह।
और फिर
न जाने कब
ये चाहत
आदत बन जाती है
और आदत
इबादत।
जहाँ
न पाने की जल्दी रहती है,
न खोने का डर—
बस एक ख्वाहिश होती है,
कि तुम यूँ ही रहो…
मेरे ख्यालों में,
मेरी रूह के आसपास।
सच…
तुम्हें चाहना
कोई कोशिश नहीं,
मेरी फितरत हो गई है
बिलकुल वैसे ही,
जैसे सांस लेना—
बिना थके,
बिना रुके,
बिना सोचे…
हमेशा।
मुकेश इलाहाबादी,
No comments:
Post a Comment