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Monday, 23 March 2026

एक धीमी जलती हुई अनुपस्थिति

 एक धीमी जलती हुई अनुपस्थिति


प्रेम

कभी तुम्हारे होने में नहीं था,

वह तो तुम्हारे न होने की

धीमी, लगातार गिरती हुई आहट में जन्मा।


तुम जब थीं,

सब कुछ साधारण था

जैसे धूप का होना,

या श्वास का चलना,

जिसे महसूस तो किया जाता है,

पर समझा नहीं जाता।


पर तुम्हारे जाने के बाद

हर वस्तु ने

तुम्हारा अभाव ओढ़ लिया,

और वही अभाव

धीरे-धीरे प्रेम बनता गया।


यह कैसी अग्नि है,

जो लपटों से नहीं जलती,

बल्कि भीतर

अदृश्य राख में बदलती रहती है

और फिर भी

हर स्पर्श पर

एक हल्की-सी तपन छोड़ जाती है।


मैंने तुम्हें

भूलने की बहुत कोशिश की,

पर हर विस्मरण के पीछे

तुम और स्पष्ट होती गईं

जैसे धुंध के हटते ही

कोई दूर का दीपक दिखने लगे।


प्रेम

अब कोई आकांक्षा नहीं रहा,

न मिलन की कोई अधूरी चाह,

वह तो बस

एक सतत् अनुपस्थिति है,

जो मेरे भीतर

तुम्हारे होने का सबसे गहरा प्रमाण बन गई है।


तुम नहीं हो

और यही तुम्हारा सबसे प्रबल होना है,

एक ऐसी उपस्थिति

जो कभी सामने नहीं आती,

पर कभी जाती भी नहीं।


प्रेम—

अब कोई कहानी नहीं,

न कोई स्मृति,

बस एक धीमी जलती हुई अनुभूति है,

जो हर क्षण

थोड़ा-थोड़ा मुझे

तुममें बदलती रहती है।


मुकेश ,,,,,,,,

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