इश्क़ और रिहाई का राज़
इश्क़
किसी दरवाज़े की कुंडी नहीं
जिसे बंद कर के
किसी को अपने पास रखा जाए।
वो तो
सुबह की हवा की तरह है
जिसे रोकोगे
तो वो ठहर नहीं पाएगी,
और जिसे खुला आसमान दो
तो वो ख़ुद
तुम्हारे आँगन में उतर आएगी।
रूहें
किसी हुक्म से नहीं जुड़तीं,
वे तो बस
एहसास की किसी नर्म डोर से
एक-दूसरे तक पहुँच जाती हैं।
जो रूह
तुम्हारी रौशनी से वाबस्ता होगी
वो बिना पुकारे
तुम्हारी तरफ़ लौट आएगी।
और जो सफ़र में
बस थोड़ी देर का मुसाफ़िर है—
वो तुम्हारी पकड़ से भी
दूर चला जाएगा।
सूफ़ियों ने कहा है
इश्क़ का सबसे गहरा इल्म
मिलने में नहीं,
बल्कि
रिहाई देने में छुपा है।
जब दिल इतना
बालिग़ हो जाए
कि वो मोहब्बत को
क़ैद करने के बजाय
आज़ाद छोड़ दे—
तभी खुलता है
वो नूरानी पर्दा
जिसके पीछे
इश्क़ और रिहाई का राज़ छुपा होता है
मुकेश ,,,,,,,,,,
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