“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
देर रात का जागता हुआ इश्क़
देर रात
जब शहर
अपनी आवाज़ें समेट लेता है,
और घड़ी
धीरे-धीरे
समय को टपकाती रहती है।
नींद
आँखों के दरवाज़े तक आती है,
पर लौट जाती है—
क्योंकि
दिल के कमरे में
एक छोटा-सा
जागता हुआ इश्क़
अब भी
बत्ती जलाए बैठा है।
मुकेश ,,,,,,
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