मेरे और तुम्हारे दरमियान की ख़ामोशी
हम पास बैठे थे
छुए बग़ैर,
मगर कुछ था
जो पहले ही
हममें मिल चुका था।
लफ़्ज़ आए भी,
तो होंठों की देहरी तक
फिर चुपचाप
लौट गए।
हमारे दरमियान
एक ख़ामोशी थी
ख़ाली नहीं,
बल्कि भरी हुई
किसी अनकहे पहचान से।
मैंने सोचा
तुम्हारा नाम लूँ
बस यूँ ही,
उसकी सदा महसूस करने को,
मगर लगा
जैसे तुम्हें पुकारना
एक फ़ासला बना देगा
जो था ही नहीं।
तुम्हारी आँखों में
कुछ ऐसा था
जो समझे जाने की
ज़िद नहीं करता था
और पहली बार
मैंने भी
समझने की कोशिश नहीं की।
दुनिया
अपनी रफ़्तार में रही
लोग बोलते रहे,
वक़्त गुजरता रहा,
कहीं कोई घड़ी
अपनी ज़िद पर अड़ी रही।
मगर यहाँ
मेरे और तुम्हारे बीच
न कोई पहले था,
न कोई बाद।
बस एक ठहराव
इतना क़रीबी,
कि सच-सा लगता था।
मुझे नहीं मालूम
तुमने क्या महसूस किया,
न ही ये कि
ये क्या था
और अजीब-सी बात है,
मुझे जानने की ज़रूरत भी नहीं।
क्योंकि उस ख़ामोशी में,
जहाँ कुछ कहा नहीं गया
सब कुछ
पहले ही
कहा जा चुका था।
मुकेश ,,,
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