अस्तित्व से परे तुम्हारा स्पर्श
जब समस्त शब्द
अपने अर्थ खो बैठते हैं,
और मौन
स्वयं एक भाषा बन जाता है,
तभी कहीं
तुम्हारा स्मरण
मेरे भीतर जन्म लेता है।
तुम
कोई रूप नहीं,
कोई सीमित उपस्थिति नहीं,
अपितु वह अनाम सत्ता हो
जो मेरे श्वासों के मध्य
अदृश्य होकर भी
सर्वाधिक सजीव है।
प्रेम—
न मिलन की परिभाषा है,
न विरह की व्यथा मात्र,
वह तो उस क्षण का विस्तार है
जहाँ ‘मैं’ और ‘तुम’
अपनी पृथकता विस्मृत कर
एक अनिर्वचनीय सत्य में विलीन हो जाते हैं।
मैंने तुम्हें
आँखों से नहीं देखा,
स्पर्श से नहीं जाना,
परंतु जब भी
अपने भीतर उतरता हूँ
तुम्हीं को पाता हूँ,
जैसे कोई प्राचीन प्रकाश
अभी-अभी जन्मा हो।
तुम्हारा अभाव भी
एक गहन उपस्थिति है,
जो हर रिक्ति को
पूर्णता का बोध कराता है।
यदि यह प्रेम है,
तो यह किसी प्राप्ति की आकांक्षा नहीं,
बल्कि एक निरंतर विसर्जन है
स्वयं को खोकर
तुममें शेष रह जाने की साधना।
और उस अंतिम शेष में
न मैं रहता हूँ, न तुम
केवल एक शाश्वत स्पंदन,
जो सृष्टि के आरंभ से
अंत तक
अखंड गूँजता रहता है।
मुकेश ,,,,,
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