मै इलाहाबाद और तुम
मैं इलाहाबाद…
और तुम
जैसे किसी ख़ामोश दास्तान की
नर्म सी परछाईं,
जो हर लफ़्ज़ के पीछे रहती है,
मगर कभी सामने नहीं आती।
मैं गलियों का वो सिलसिला
जिसमें सदियों की धूल भी है
और ख़्वाबों की चमक भी,
जहाँ हर मोड़ पर
किसी शायर की आह
अब भी हवा में तैरती है।
और तुम
शायद वही आह हो,
जो सुनाई तो नहीं देती,
मगर हर मिसरे में उतर आती है।
मैं दारागंज की सुबह,
जहाँ गंगा की लहरें
अल्फ़ाज़ को वुज़ू कराती हैं,
जहाँ सूरज
धीरे-धीरे
पानी में अपना अक्स लिखता है
जैसे कोई क़सीदा हो
जो खुदा के नाम से शुरू होता है।
और तुम
वही पहली रोशनी,
जो लहरों पर गिरकर
उन्हें सोना बना देती है।
मैं संगम का सुकून,
जहाँ गंगा, यमुना
और एक अदृश्य सरस्वती
रूह की तहों में उतरती हैं,
जहाँ पानी नहीं
तीन ख़ामोश दुआएँ मिलती हैं।
और तुम
शायद वही सरस्वती हो,
जो दिखती नहीं,
मगर हर एहसास में बहती है।
मैं सिविल लाइन्स की शाम,
जहाँ कॉफ़ी के प्यालों में
फ़लसफ़े उबलते हैं,
जहाँ हर मेज़ पर
एक अधूरी कहानी बैठी रहती है
और हर कहानी में
तुम्हारा एक नाम होता है
जो कभी लिया नहीं जाता।
मैं यूनिवर्सिटी की सीढ़ियाँ,
जहाँ किताबें सिर्फ़ इल्म नहीं
इश्क़ भी सिखाती हैं,
जहाँ लफ़्ज़ों के दरमियान
ख़ामोशियाँ भी
ग़ज़ल बन जाती हैं।
और तुम
वही ख़ामोशी,
जिसे पढ़ने के लिए
दिल चाहिए होता है,
दिमाग़ नहीं।
मैं कटरा की भीड़,
जहाँ हर शख़्स जल्दी में है,
मगर वक़्त
कहीं ठहर-सा जाता है
जब कोई पुरानी धुन
अचानक हवा में घुल जाती है।
और तुम
वही धुन,
जो किसी भी शोर में
अपनी पहचान बना लेती है।
मैं चौक की तंग गलियाँ,
जहाँ रंग हैं,
रौनक है,
और एक अजीब-सी बेफ़िक्री,
जैसे ज़िंदगी
किसी किताब का आख़िरी सफ़ा हो
जिसे लोग
बार-बार पढ़ना चाहते हैं।
और तुम
वही आख़िरी सफ़ा,
जिसे पढ़कर
दिल ठहर जाता है,
मगर बंद नहीं होता।
मैं इलाहाबाद…
अपने हर मोड़ पर
तुम्हें ढूँढता हुआ,
हर दरिया में
तुम्हारा अक्स तलाशता हुआ,
हर शेर में
तुम्हारा ज़िक्र छुपाता हुआ।
और तुम
हमेशा नज़र से ओझल,
मगर रूह के क़रीब,
जैसे कोई राज़
जिसे बयान करना
उसकी तौहीन हो।
कभी-कभी
मैं सोचता हूँ
क्या तुम सच में हो भी
या बस
इस शहर की रूह ने
मुझे तन्हा होने से बचाने के लिए
तुम्हारा ख़्याल रच दिया है?
मगर फिर
जब गंगा की लहरें
बिना वजह मुस्कुराती हैं,
जब यमुना की ख़ामोशी
कुछ कहने लगती है,
जब किसी शायर का मिसरा
सीधे दिल में उतर जाता है
तो यक़ीन हो जाता है…
कि तुम हो।
तुम हो
इस शहर की हर साँस में,
हर राग में,
हर मस्ती में,
हर तहज़ीब में,
हर उस लम्हे में
जहाँ इलाहाबाद
सिर्फ़ शहर नहीं रहता,
एक एहसास बन जाता है।
और मैं
बस वही एहसास हूँ,
जो तुम्हें हर जगह ढूँढता है…
मैं इलाहाबाद…
और तुम
मेरी हर नज़्म का
अनकहा मिसरा।
मुकेश ,
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