यादों की धीमी जलती हुई लौ
राख के नीचे बची हुई आग
यादें कभी बुझती नहीं
वे बस अपना रूप बदल लेती हैं।
कभी लपट थीं,
अब अंगार हैं
धीमे, धैर्य से,
अंदर ही अंदर जलते हुए।
तुम समझते हो
कि सब बीत गया—
मगर वक़्त
सिर्फ़ ऊपर-ऊपर से गुज़रता है,
अंदर…
सब जस का तस रहता है।
1. ठहराव की तपिश
कुछ लम्हे जाते नहीं—वे हमारे भीतर ताप बनकर रह जाते हैं।
जो बहुत गहराई से जीया गया हो—वो कभी ठंडा नहीं पड़ता।
यादें समय से नहीं—स्पर्श से बनती हैं।
जो पल तुम्हें बदल गया—वो कभी पीछे नहीं छूटता।
ठहरे हुए लम्हे ही, सबसे ज़्यादा जलते हैं।
2. अधूरी बातों का धुआँ
जो कहा नहीं गया—वही सबसे ज़्यादा धुआँ देता है।
अधूरी बातें बुझती नहीं—वे सुलगती रहती हैं।
हर “काश” एक छोटी-सी आग है।
जो लफ़्ज़ होंठों तक आकर रुक गए—वो दिल में अंगार बन जाते हैं।
अधूरापन ही यादों की असली ईंधन है।
3. गुज़र चुके लोगों की गर्मी
कुछ लोग चले जाते हैं—पर उनकी गर्मी नहीं जाती।
उनकी आवाज़, उनके हावभाव—सब भीतर कहीं जीवित रहते हैं।
जो अब नहीं है—वही सबसे ज़्यादा महसूस होता है।
यादें, मौजूदगी की परछाईं नहीं—उसकी शेष गर्मी हैं।
किसी का जाना, उसके असर को खत्म नहीं करता।
4. तन्हाई की रात में
रात, यादों को और पास ले आती है।
तन्हाई में हर अंगार थोड़ा और चमक उठता है।
जो दिन में दबा रहता है—वो रात में बोलता है।
तन्हाई, यादों की सबसे सच्ची ज़मीन है।
जो अकेले में जलता है—वही असली है।
5. समय के आगे भी
वक़्त, यादों को मिटाता नहीं—बस उन्हें सहना सिखा देता है।
कुछ आगें बुझने के लिए नहीं—साथ चलने के लिए होती हैं।
जो बीत गया—वो खत्म नहीं हुआ, बस रूप बदल गया।
यादें, वक़्त की कैद में नहीं रहतीं।
जो सच में था—वो हमेशा रहेगा, किसी न किसी ताप में।
जलना भी एक रौशनी है
इन पंक्तियों में
मैंने यादों को बुझाने की कोशिश नहीं की
उन्हें स्वीकार करने की कोशिश की है।
क्योंकि…
हर जलन दर्द नहीं होती—
कुछ जलनें
हमें ज़िंदा होने का अहसास कराती हैं।
और ये धीमी जलती हुई लौ
शायद यही है
जो हमें
हमारे बीते हुए से जोड़े रखती है।
मुकेश ,,,
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