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Friday, 27 March 2026

मैं ख़ामोशी और तुम उसकी आवाज़

 मैं ख़ामोशी और तुम उसकी आवाज़


मैं ख़ामोशी…

एक ठहरी हुई झील,

जिसमें लफ़्ज़ों के पत्थर

डूबकर भी

कोई लहर नहीं उठाते।


और तुम

उस झील पर गिरती

पहली बूंद की आहट,

जो सन्नाटे को

राग में बदल देती है।


मैं वो खालीपन

जो दिल के किसी कोने में

बिना वजह ठहरा रहता है,

जहाँ आवाज़ें

आने से डरती हैं।


और तुम

वही नर्म सी दस्तक,

जो दरवाज़ा खटखटाए बिना ही

अंदर चली आती है।


मैं ख़ामोशी…

जिसने बहुत कुछ देखा है,

मगर कहा कुछ भी नहीं,

जिसने हर सवाल को

अपने भीतर दफ़्न किया है।


और तुम

वही जवाब,

जो लबों तक नहीं आता,

मगर हर धड़कन में

सुनाई देता है।


कभी-कभी

मैं खुद को सुनता हूँ

तो सिर्फ़ सन्नाटा मिलता है,

जैसे कोई वीरान शहर

अपनी ही गूँज में खो गया हो।


मगर जब तुम

मेरे क़रीब होती हो

तो वही सन्नाटा

धीरे-धीरे

अल्फ़ाज़ में ढलने लगता है।


मैं ख़ामोशी…

जिसे समझने के लिए

वक़्त चाहिए,

सब्र चाहिए,

और थोड़ी सी तन्हाई भी।


और तुम

वो आवाज़,

जो बिना किसी सब्र के

सीधे दिल तक पहुँच जाती है।


तुम्हारी मौजूदगी

कोई शोर नहीं है,

कोई हंगामा नहीं


वो तो बस

एक धीमी-सी लय है,

जो मेरी ख़ामोशी के अंदर

कहीं गूंजती रहती है।


मैंने तुम्हें

कभी पुकारा नहीं,

क्योंकि मुझे डर था

कि कहीं आवाज़ देकर

मैं तुम्हें खो न दूँ।


और तुम

बिना पुकारे ही

मेरे भीतर उतरती रहीं,

जैसे कोई धुन

जो खुद-ब-खुद

दिल में बस जाती है।


मैं ख़ामोशी…

तुम्हारे बिना

अधूरी नहीं,

मगर बेजान ज़रूर हूँ।


और तुम

मेरे बिना

आवाज़ तो हो,

मगर शायद

तुम्हें भी कोई सुनने वाला चाहिए।


हम दोनों

एक ही कहानी के

दो पहलू हैं,

जहाँ मैं ठहराव हूँ,

और तुम बहाव।


मैं ख़ामोशी…

और तुम उसकी आवाज़


दोनों मिल जाएँ

तो एक राग बनता है,

जो सुना नहीं जाता,

महसूस किया जाता है।


और शायद…

यही हमारा रिश्ता है—


तुम मुझे बोलना सिखाती हो,

और मैं तुम्हें

गहराई देता हूँ।


मैं ख़ामोशी…

और तुम उसकी आवाज़


एक ही रूह के

दो अलग-अलग अहसास,

जो जुदा होकर भी

कभी जुदा नहीं होते।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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