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Thursday, 19 March 2026

अबूझ लड़की की बात

अबूझ लड़की की बात


वो अबूझ है...

जैसे आधे खुले खत के आख़िरी लफ्ज़,

जैसे बारिश के बाद भीगी मिट्टी में

दबी हुई कोई भूली याद।

मैं उसे मेसेज करता हूँ 

हर बार कुछ कहना होता है,

हर बार कुछ रह जाता है।

वो देखती है...

पर जवाब नहीं देती।

उसकी चुप्पी,

कभी-कभी चीख़ से भी ज़्यादा भारी लगती है,

जैसे कुछ टूट रहा हो

बिना आवाज़ के।

उसकी ईमोज़ी 

छोटी-छोटी ख़ुशबूदार चुप्पियाँ हैं,

जैसे गुलाब की पंखुड़ी से

नर्म-सा इनकार।

वो देर तक ऑनलाइन रहती है 

पर वहाँ नहीं होती

जहाँ मैं उसे ढूँढता हूँ।

न पोस्ट पे कमेंट,

न लाइक,

न ही कोई “क्या हाल है?”

बस कोई पुरानी दीवार के पीछे

एक साया चलता है

जिसे मैं पहचान नहीं पाता।

कभी-कभी वो आती है

बिल्कुल अचानक 

जैसे किसी खंडहर में फूल उग आया हो

बेमौसम।

और कभी-कभी

“ना” कहकर ऐसे चली जाती है

जैसे कभी थी ही नहीं।

वो अबूझ है —

पर उसकी अबूझी ही

सबसे ज़्यादा साफ़ है

मेरे लिए।



एक रहस्य,

जो जितना पास आता है

उतना ही खो जाता है

मेरे इंतज़ार के कोनों में।


मुकेश ,

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