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Monday, 2 March 2026

खिड़की, हवा और आधा सा मन

 खिड़की, हवा और आधा सा मन


खिड़की आधी खुली है,

जैसे कोई फैसला अभी बाकी हो।

हवा आती है धीरे-धीरे,

पर भीतर तक नहीं उतरती।


परदे काँपते हैं हल्के से,

जैसे किसी नाम की आहट हो,

मैं उठकर देखता हूँ हर बार —

पर सामने सिर्फ़ रात होती है।


मेरा मन भी कुछ ऐसा ही है,

आधा तुम्हारी याद में भीगा,

आधा अपने ही संकोच में सूखा।


कितनी बार चाहा

पूरी तरह खोल दूँ खिड़की,

कि हवा बेधड़क आए

और जो बचा है उसे भी उड़ा ले जाए।


पर जाने क्यों

एक कोना थामे रहता हूँ 

शायद उम्मीद की तरह,

शायद डर की तरह।


खिड़की खुली है,

हवा आती-जाती है,

और मेरा आधा सा मन

तुम्हारे पूरे होने की प्रतीक्षा में

धीरे-धीरे सांस लेता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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