गालों की लाली में छुपा फागुन
तुम्हारे गालों की लाली में
कोई मौसम चुपचाप पनपता है,
जैसे सर्द सुबह के बाद
धूप पहली बार ठहरती हो।
वो रंग बाज़ार का नहीं,
न किसी शीशी में क़ैद,
वो तो भीतर की हल्की-सी धड़कन है
जो बाहर आकर गुलाल बन जाती है।
जब तुम झेंपकर मुस्कुराती हो,
लाली ज़रा और गहरी हो जाती है—
मानो फागुन ने
अपनी पिचकारी वहीं रख दी हो।
उस रंग में न शोर है,
न ढोल की थाप,
बस एक धीमी-सी हरारत है
जो देखने वाले के दिल तक उतरती है।
मैंने कई बार सोचा है
इतनी सी लाली में
इतना सारा मौसम कैसे समा जाता है?
शायद इसलिए
कि तुम्हारे गालों की उस नर्म आभा में
रंग से ज़्यादा
इकरार बसता है—
और वही इकरार
हर बार
नया फागुन ले आता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,
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