सुन के अपनी तारीफ़ लजा के बैठी है

सुन के अपनी तारीफ़ लजा के बैठी है
रात  आँचल में सितारे सजा के बैठी है

बहुत प्यारी बहुत खूबसूरत लगती है
माथे पे चाँद का टीका लगा के बैठी है 

चेहरे का नूर चांदनी बन कर पसरा है
साँझ से ही सारे दीपक बुझा के बैठी है

अपने पिया की दुलारी है, राजरानी है
गोरे गोरे हाथो में मेहंदी रचा के बैठी है

क़ायनात का ज़र्रा ज़र्रा प्यार करता है
रात,जो साँवला आँचल लहरा के बैठी है

मुकेश इलाहाबादी ----------------------

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