होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Thursday, 3 July 2014

सुन के अपनी तारीफ़ लजा के बैठी है

सुन के अपनी तारीफ़ लजा के बैठी है
रात  आँचल में सितारे सजा के बैठी है

बहुत प्यारी बहुत खूबसूरत लगती है
माथे पे चाँद का टीका लगा के बैठी है 

चेहरे का नूर चांदनी बन कर पसरा है
साँझ से ही सारे दीपक बुझा के बैठी है

अपने पिया की दुलारी है, राजरानी है
गोरे गोरे हाथो में मेहंदी रचा के बैठी है

क़ायनात का ज़र्रा ज़र्रा प्यार करता है
रात,जो साँवला आँचल लहरा के बैठी है

मुकेश इलाहाबादी ----------------------

No comments:

Post a Comment