छत पे गुनगुनी धूप सा

सर्द मौसम में
जब
कोहरे की चादर
बदन को लपटे होती है
सच
तब,
तुम्हरी यादें
छत पे गुनगुनी धूप सा
बिछ जाती हैं

मुकेश इलाहबदी --

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