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Sunday, 22 February 2026

उसकी अनकही ख़ामोशी

 उसकी अनकही ख़ामोशी

1
जब वो कुछ नहीं कहती,
तो लगता है जैसे शब्द
उसके होंठों पर आकर
प्रार्थना बन गए हों।

2
उसकी ख़ामोशी में
एक धीमी-सी धड़कन है—
जैसे किसी बंद किताब में
दबा हुआ ख़त अब भी सांस ले रहा हो।

3
वो जब चुप रहती है,
तो मैं समझता हूँ—
हर उत्तर बोलना ज़रूरी नहीं,
कुछ जवाब आँखों की तह में रखे जाते हैं।

4
उसकी अनकही बातें
हवा में तैरती हैं,
और मैं
उन्हें अपने भीतर उतरता हुआ महसूस करता हूँ।

5
वो मुस्कुरा कर चुप हो जाती है—
जैसे कोई दरवाज़ा खुलकर भी
पूरी तरह न खुला हो।

6
उसकी ख़ामोशी में
शिकायत नहीं,
एक थकी हुई समझ है—
जैसे बहुत कुछ कहकर भी
कुछ बचा लिया हो।

7
कभी-कभी लगता है
वो अपनी चुप्पी से
मुझे सुन रही है—
जैसे मेरी हर अधूरी पंक्ति
उसे पहले से याद हो।

8
उसकी खामोशी
कोई खालीपन नहीं,
वो एक पूरा आकाश है—
जहाँ शब्द पंछी बनकर
उड़ने से पहले ठहरते हैं।

9
मैं जब उसे सोचता हूँ,
तो उसकी आवाज़ नहीं,
उसकी चुप्पी सुनाई देती है—
और वही सबसे गहरी ध्वनि होती है।

10
वो कुछ नहीं कहती,
पर उसकी अनकही ख़ामोशी
मेरे भीतर
एक लंबी कविता लिख जाती है—
जिस पर उसका नाम नहीं,
बस उसका एहसास दर्ज होता है।

— मुकेश

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