एक चेहरा था जिसे मैंने अपना समझ लिया था
एक चेहरा था
जिसे मैंने अपना समझ लिया था
जैसे आईने में दिखती परछाईं
कभी छूट ही नहीं सकती।
उसकी हँसी में
मैंने अपने दिनों की रोशनी रख दी,
उसकी आँखों में
अपने सारे यक़ीन।
मगर चेहरों की भी उम्र होती है,
वक़्त उन्हें बदल देता है
जैसे धूप दीवारों के रंग चुरा लेती है।
अब वो चेहरा
कहीं है भी, या नहीं
मुझे नहीं मालूम।
बस इतना जानता हूँ,
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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