पुरानी हवेली
पुरानी हवेली की दीवारों पर
वक़्त धूल बनकर चिपका है,
और छज्जों से झरती है
गुज़रे सालों की थकान।
आँगन में एक बूढ़ी औरत बैठी है
उसकी आँखें धुँधली नहीं,
बस बहुत कुछ देख लेने से शांत हैं।
कबूतरों की गुटरगूँ
उसके इर्द-गिर्द ऐसे घूमती है
जैसे बीते दिनों की धीमी सलाह।
वो दानों की मुट्ठी खोलती है,
और हर दाना
किसी याद का टुकड़ा बन जाता है।
लॉन बेरौनक पड़ा है
घास की जगह सन्नाटा उगा है,
और फव्वारा
सालों से पानी का नाम भूल चुका है।
सीढ़ियों के पास
एक कुत्ता ऊँघ रहा है,
मानो पहरा देते-देते
अब ख़्वाबों में भी चौकन्ना हो गया हो।
सड़क बाहर से गुज़रती है
सुनसान, लंबी,
जैसे किसी कहानी का आख़िरी वाक्य।
हवेली साँस लेती है,
धीमे-धीमे,
और बूढ़ी औरत की चुप्पी में
पूरा अतीत
गुटरगूँ करता रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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