“
वो कहती थी,
मेरे बदन पर तिल नहीं,
छोटे-छोटे सितारे हैं।
कंधे के पास वाला,
जिसे मैं कभी गिनता भी नहीं था,
उसके लिए वह एक पहचान था
“यहीं से तुम शुरू होते हो,”
वो मुस्कुरा कर कहती।
गर्दन के पीछे का हल्का सा निशान,
जिसे मैं आईने में ढूँढ नहीं पाता,
वो बिना देखे बता देती
“यहाँ है… बिल्कुल यहीं।”
मुझे अचरज होता था,
कैसे किसी ने
मेरे शरीर को
इतनी तसल्ली से पढ़ा है,
जैसे कोई पुरानी किताब
जिसे बार-बार खोला गया हो।
पर बात सिर्फ़ त्वचा की नहीं थी।
वो जानती थी
किस तिल के पास मैं असहज हो जाता हूँ,
किस स्पर्श पर मैं चुप हो जाता हूँ।
मेरे बदन का नक्शा
उसके लिए भूगोल नहीं,
एक कहानी था।
आज आईने में देखता हूँ
सब कुछ वैसा ही है।
तिल, निशान,
त्वचा की वही रेखाएँ।
पर अब कोई नहीं कहता
“यहाँ से तुम शुरू होते हो…”
और शायद
किसी के द्वारा पहचाना जाना ही
सबसे गहरा स्पर्श होता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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