घर में मौजूद मगर घर से ग़ायब लोग
वे यहीं हैं
ड्रॉइंग रूम की सोफ़ा-रेखा पर बैठे,
रसोई की आहट में चलते,
सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते
पर जैसे घर की धड़कन से कटे हुए।
दीवार पर टंगी घड़ी
उनकी मौजूदगी गिनती है,
पर समय भी जानता है
यह सिर्फ़ देहों का आना-जाना है,
रूहों का नहीं।
टेबल पर थाली सजी है,
चाय की भाप उठती है,
टीवी बोलता रहता है,
मोबाइल की स्क्रीन चमकती है
पर बातचीत
किसी पुराने संदूक में बंद है।
वे पूछते हैं
“सब ठीक?”
और उत्तर आता है
“हाँ।”
इस छोटे-से शब्द में
कितनी दूरियाँ समाई हैं,
किसी ने नापी नहीं।
घर अब एक पता है,
एक वाई-फाई का पासवर्ड,
एक साथ ली गई तस्वीर
पर वह आँगन कहाँ है
जहाँ नज़रें मिलती थीं
और चुप्पी भी साझा होती थी?
घर में मौजूद लोग
धीरे-धीरे
घर से ग़ायब हो जाते हैं
जब वे एक-दूसरे को देखना छोड़ देते हैं,
सिर्फ़ देखे जाने का अभिनय करते हैं।
शायद
घर ईंटों से नहीं बनता,
न एक ही छत के नीचे रहने से
घर तब बनता है
जब कोई पूछे,
“तुम सच में कैसे हो?”
और इंतज़ार करे
उस जवाब का
जो आँखों से निकलता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment