सीसीटीवी की निगरानी में अकेलापन
हर कोने में एक आँख टंगी है
ठंडी, गोल, निर्विकार।
दीवार पर लगा हुआ सच,
जो सब देखता है
पर कुछ कहता नहीं।
CCTV की निगरानी में
चलते हुए कदम
संभल जाते हैं,
हँसी थोड़ी सिमट जाती है,
और आँसू
जेब में रख लिए जाते हैं।
कितना अजीब है
इतनी आँखों के बीच
इंसान और अकेला हो जाता है।
हर हरकत रिकॉर्ड होती है,
पर दिल की खामोशी
किसी हार्ड-डिस्क में सेव नहीं होती।
कैमरे की लाल बत्ती
टिमटिमाती रहती है—
जैसे किसी ने कहा हो,
“तुम दिख रहे हो।”
पर कोई यह नहीं पूछता
“तुम महसूस कैसे कर रहे हो?”
निगरानी में
गलतियाँ कम होती हैं,
पर रिश्ते भी
संकोच में जीने लगते हैं।
आवाज़ें धीमी,
स्पर्श संयत,
और विचार
अपने ही भीतर कैद।
शायद
सबसे गहरी तन्हाई वही है
जहाँ तुम्हें देखा तो जा रहा है,
पर समझा नहीं जा रहा।
सीसीटीवी की दुनिया में
अकेलापन एक अपराध नहीं,
बस एक अनरिकॉर्डेड फ़ाइल है
जो हर रात
अपने आप डिलीट हो जाती है,
और सुबह फिर
नई फुटेज के साथ
जी उठती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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