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Saturday, 21 February 2026

सीसीटीवी की निगरानी में अकेलापन

 सीसीटीवी की निगरानी में अकेलापन


हर कोने में एक आँख टंगी है

ठंडी, गोल, निर्विकार।

दीवार पर लगा हुआ सच,

जो सब देखता है

पर कुछ कहता नहीं।


CCTV की निगरानी में

चलते हुए कदम

संभल जाते हैं,

हँसी थोड़ी सिमट जाती है,

और आँसू

जेब में रख लिए जाते हैं।


कितना अजीब है

इतनी आँखों के बीच

इंसान और अकेला हो जाता है।

हर हरकत रिकॉर्ड होती है,

पर दिल की खामोशी

किसी हार्ड-डिस्क में सेव नहीं होती।


कैमरे की लाल बत्ती

टिमटिमाती रहती है—

जैसे किसी ने कहा हो,

“तुम दिख रहे हो।”

पर कोई यह नहीं पूछता

“तुम महसूस कैसे कर रहे हो?”


निगरानी में

गलतियाँ कम होती हैं,

पर रिश्ते भी

संकोच में जीने लगते हैं।

आवाज़ें धीमी,

स्पर्श संयत,

और विचार

अपने ही भीतर कैद।


शायद

सबसे गहरी तन्हाई वही है

जहाँ तुम्हें देखा तो जा रहा है,

पर समझा नहीं जा रहा।


सीसीटीवी की दुनिया में

अकेलापन एक अपराध नहीं,

बस एक अनरिकॉर्डेड फ़ाइल है

जो हर रात

अपने आप डिलीट हो जाती है,

और सुबह फिर

नई फुटेज के साथ

जी उठती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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