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Thursday, 12 March 2026

अध्याय – 10 : प्रोफ़ाइल की रोशनी

 

लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 10 : प्रोफ़ाइल की रोशनी

शाम
धीरे-धीरे
कमरे में उतर रही थी।

खिड़की से आती हवा
अब थोड़ी ठंडी हो गई थी।

मेज़ पर
काग़ज़ों का छोटा-सा ढेर
हल्के से हिल रहा था।

लैपटॉप
अब भी खुला था।

स्क्रीन पर
उसका नाम
शांत चमक रहा था।

मैंने
कुछ क्षण
उसे देखा।

फिर
धीरे से
उसकी प्रोफ़ाइल खोल दी।

यह काम
बहुत साधारण था।

बस
एक क्लिक।

पर न जाने क्यों
मुझे लगा
जैसे मैं
किसी पुराने दरवाज़े को
धीरे-धीरे खोल रहा हूँ।

प्रोफ़ाइल खुली।

सबसे ऊपर
उसकी तस्वीर थी।

वह अब
पहले से थोड़ी अलग दिख रही थी।

चेहरे पर
वही मुस्कान थी
पर उसमें
अब एक हल्की परिपक्वता जुड़ गई थी।

जैसे समय ने
उसके चेहरे पर
धीरे से
कुछ रेखाएँ खींच दी हों।

मैंने
स्क्रीन के पास झुककर
तस्वीर को देखा।

अजीब बात है—

कुछ चेहरे
समय के साथ बदलते नहीं
बस गहरे हो जाते हैं।

नीचे
उसकी कुछ पोस्ट थीं।

मैंने
धीरे-धीरे स्क्रॉल किया।

पहले
कुछ सामान्य बातें थीं—

यात्रा की तस्वीरें
दोस्तों के साथ हँसी
किसी शहर की सड़क।

फिर
अचानक
एक पोस्ट पर
मेरी नज़र रुक गई।

वह
एक छोटी-सी कविता थी।

मैंने
उसे ध्यान से पढ़ा।

उसकी भाषा
सरल थी
पर उसमें
एक अजीब-सी शांति थी।

जैसे
कोई व्यक्ति
अपने भीतर की बात
बहुत धीरे से कह रहा हो।

मैंने मन ही मन सोचा—

तो
वह लिखती है।

यह जानकर
मन में
एक छोटी-सी खुशी
फैल गई।

क्योंकि
लेखन
एक अजीब चीज़ है।

जो लोग लिखते हैं
वे अक्सर
दुनिया को
थोड़ा अलग तरह से देखते हैं।

उनके लिए
पेड़ सिर्फ़ पेड़ नहीं होता।

हवा
सिर्फ़ हवा नहीं होती।

और
मौन
सिर्फ़ चुप्पी नहीं होता।

मैंने
उसकी दूसरी कविता पढ़ी।

उसमें
बारिश का ज़िक्र था।

तीसरी में
एक खिड़की का।

मैं अचानक
मुस्कुरा दिया।

कितनी अजीब बात है—

मैं भी
पिछले कुछ दिनों से
खिड़की पर लिख रहा था।

क्या यह
सिर्फ़ संयोग है?

या
दुनिया में
कुछ विचार
एक साथ जन्म लेते हैं?

मुझे याद आया—

एक बार
किसी लेख में
मैंने पढ़ा था कि

विचार
किसी एक व्यक्ति के नहीं होते

वे
समय के होते हैं।

कुछ देर तक
मैं उसकी प्रोफ़ाइल में
चुपचाप घूमता रहा।

फिर
एक तस्वीर पर
नज़र ठहर गई।

वह
किसी पहाड़ी जगह पर खड़ी थी।

पीछे
धुंध थी।

हवा
उसके बालों को
हल्का-सा उड़ा रही थी।

और उसके चेहरे पर
वही पुरानी
शांत मुस्कान थी।

मैंने
धीरे से साँस ली।

और अचानक
एक अजीब-सा विचार आया—

क्या पता
वह भी कभी
मुझे याद करती हो?

शायद नहीं।

शायद हाँ।

समय
अक्सर
इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देता।

लैपटॉप की स्क्रीन
धीरे-धीरे
हल्की हो रही थी।

शाम
अब लगभग
रात में बदल रही थी।

मैंने
फिर से
उस बटन की ओर देखा—

Add Friend

एक छोटा-सा निर्णय।

पर उसके पीछे
इतनी संभावनाएँ।

मैंने
उँगली माउस पर रखी।

और इस बार
कुछ देर तक
वहीं रुका रहा।

कमरे में
मौन था।

खिड़की से आती हवा
धीरे-धीरे
परदे को हिला रही थी।

और उसी मौन में
मुझे लगा—

कभी-कभी
जीवन के सबसे बड़े प्रश्न

बहुत छोटे बटनों के सामने
खड़े होते हैं।

मैंने
अब भी क्लिक नहीं किया।

बस
लैपटॉप बंद कर दिया।

और सोचने लगा—

कहानी
कभी-कभी
यहीं से शुरू होती है

जहाँ हम
उसे शुरू करने से
थोड़ा डरते हैं।

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