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Thursday, 12 March 2026

अध्याय – 09 : वह लड़की और दोपहर की धूप

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 09 : वह लड़की और दोपहर की धूप


स्क्रीन

अब भी

मेरे सामने खुली थी।


उसका नाम

वहीं था।


नीली रोशनी में

हल्का-सा चमकता हुआ।


मैंने अभी तक

फ्रेंड रिक्वेस्ट नहीं भेजी थी।


कर्सर

बटन के पास जाता

फिर वापस आ जाता।


मैंने

लैपटॉप थोड़ा बंद किया।


कमरे में

दोपहर की धूप

धीरे-धीरे फैल रही थी।


खिड़की से आती हवा

काग़ज़ों को

हल्का-हल्का हिला रही थी।


और उसी हवा के साथ

एक पुरानी स्मृति

धीरे-धीरे

मेरे भीतर खुलने लगी।


वह लड़की।


मुझे आज भी याद है

उसकी चाल

थोड़ी तेज़ होती थी।


जैसे वह हमेशा

कहीं पहुँचने की जल्दी में हो।


उसकी हँसी

बहुत तेज़ नहीं

पर बहुत साफ़ थी।


जैसे

काँच पर गिरती

हल्की बारिश।


कॉलेज के उस पुराने बरामदे में

दोपहर की धूप

हमेशा तिरछी आती थी।


वही धूप

उसके बालों पर पड़ती थी।


और मैं

अक्सर दूर खड़े होकर

उसे देख लिया करता था।


हमारी बातचीत

बहुत कम हुई थी।


शायद

तीन या चार बार।


पर अजीब बात है—


कुछ लोग

इतनी कम मुलाक़ातों में भी

मन में जगह बना लेते हैं।


मुझे याद है

वह हमेशा

अपने बैग में

एक मोटी-सी किताब रखती थी।


कभी-कभी

वह लाइब्रेरी के कोने में बैठकर

पढ़ती रहती थी।


मैं दूर की मेज़ पर बैठकर

उसे देखता था।


और किताब खोलकर

कुछ भी नहीं पढ़ता था।


उस दिन

दोपहर कुछ ऐसी ही थी।


बरामदे के बाहर

गुलमोहर का पेड़ था।


उसके लाल फूल

धीरे-धीरे गिर रहे थे।


हवा चलती

तो कुछ फूल

सीढ़ियों पर आ गिरते।


वह

सीढ़ियों से उतरते हुए

एक फूल उठाती

और कुछ देर

उसे देखती रहती।


फिर

मुस्कुराकर

उसे वहीं रख देती।


उस समय

मैंने पहली बार सोचा था—


कितना अजीब है

कि किसी को देखकर

मन इतना शांत भी हो सकता है।


यह

शायद प्रेम नहीं था।


या शायद

प्रेम की शुरुआत थी।


मुझे नहीं पता।


मैं

बस उसे देखता था।


और मन में

एक हल्की-सी खुशी

फैल जाती थी।


कमरे में

अचानक

एक काग़ज़ उड़कर

मेज़ से नीचे गिर गया।


मैंने झुककर

उसे उठाया।


लैपटॉप

अब भी खुला था।


स्क्रीन पर

उसका नाम

अब भी चमक रहा था।


मैंने

धीरे से साँस ली।


और मन में सोचा—


समय

कितना अजीब होता है।


कुछ लोग

हमारे जीवन में

बस कुछ महीनों के लिए आते हैं।


फिर

सालों तक

नज़र नहीं आते।


पर अचानक

एक दिन


एक स्क्रीन पर

उनका नाम दिख जाता है


और लगता है—


जैसे

समय

वापस लौट आया हो।


मैंने

माउस फिर उठाया।


कर्सर

धीरे-धीरे

“Add Friend” की ओर बढ़ा।


पर इस बार भी

मैंने क्लिक नहीं किया।


मैं बस

कुछ देर

उस नाम को देखता रहा।


और सोचता रहा—


क्या स्मृति भी

एक तरह का प्रेम होती है?


या प्रेम

दरअसल


स्मृति की सबसे उजली शक्ल है।


कमरे में

शाम की हल्की आहट

धीरे-धीरे उतर रही थी।


खिड़की से आती हवा

अब थोड़ी ठंडी हो गई थी।


और मेरे सामने


एक स्क्रीन

एक नाम

और


एक अधूरा निर्णय

शांत बैठा था।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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