होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Thursday, 12 March 2026

अध्याय – 08 : एक नाम, एक स्क्रीन और प्रेम का प्रश्न

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 08 : एक नाम, एक स्क्रीन और प्रेम का प्रश्न


दोपहर

धीरे-धीरे

कमरे में उतर आई थी।


चाय का कप

अब खाली था।


मेज़ पर

कलम और काग़ज़

अभी भी शांत पड़े थे।


मैंने कुछ देर

उन्हें देखा।


फिर

लैपटॉप की ओर हाथ बढ़ाया।


कई दिनों से

मैंने उसे खोला नहीं था।


लेखन में डूबा हुआ मन

कभी-कभी

दुनिया से थोड़ा दूर चला जाता है।


पर आज

न जाने क्यों

अचानक मन हुआ—


देखूँ

दुनिया में क्या चल रहा है।


मैंने लैपटॉप खोला

और बहुत दिनों बाद

Facebook खोल लिया।


स्क्रीन पर

धीरे-धीरे

कई चेहरे उभरे।


किसी की यात्रा

किसी की मुस्कान

किसी की सफलता।


मैं बस

उन्हें देखता रहा।


फिर

अचानक

मेरी नज़र

एक नाम पर ठहर गई।


Friend Suggestion.


एक नाम।


और वही नाम

जिसे मैंने

सालों से

मन की किसी शांत तह में रख छोड़ा था।


मेरी उँगली

माउस पर रुक गई।


दिल की धड़कन

जरा-सी बदल गई।


मैं कुर्सी पर

थोड़ा सीधा बैठ गया।


“क्या यह वही है?”


मैंने धीरे से

अपने आप से पूछा।


तस्वीर छोटी थी

पर पहचान

स्पष्ट थी।


वही आँखें।


वही हल्की मुस्कान।


मेरे कॉलेज के दिनों की

एक पुरानी धड़कन।


मेरी

पहली चुप-सी पसंद।


मैं कुछ क्षण

स्क्रीन को देखता रहा।


फिर

एक अजीब-सी खुशी

मन में फैलने लगी।


जैसे

समय ने अचानक

पीछे मुड़कर

मुझे आवाज़ दी हो।


पर उसी के साथ

एक दूसरा विचार भी आया—


Friend Request भेजूँ?


या

न भेजूँ?


उँगली

बटन के पास गई

फिर वापस आ गई।


मैं कुर्सी पर

पीछे टिक गया।


और अचानक

मेरे भीतर

एक लंबा संवाद शुरू हो गया।


“यह क्या है?”


“सिर्फ़ एक नाम?”


“या

एक पुराना एहसास?”


मैंने आँखें बंद कर लीं।


और तभी

मेरे भीतर

एक प्रश्न उठने लगा—


प्रेम क्या होता है?


क्या प्रेम

वह है

जो किसी के सामने होने पर

दिल की गति बदल दे?


या वह

जो वर्षों बाद भी

सिर्फ़ एक नाम देखकर

मन में हल्की-सी रोशनी जगा दे?


मैं सोचने लगा—


कभी-कभी

हम किसी से

बहुत कम मिलते हैं।


कभी

कह भी नहीं पाते

जो कहना चाहते थे।


फिर भी

वह व्यक्ति

मन के भीतर

किसी कोमल स्मृति की तरह

रह जाता है।


शायद

प्रेम हमेशा

पूर्ण नहीं होता।


कई बार

वह अधूरा ही

सबसे सुंदर होता है।


मैंने फिर

स्क्रीन की ओर देखा।


उसका नाम

अब भी

वहीं चमक रहा था।


“Add Friend”


एक छोटा-सा बटन।


पर उसके पीछे

इतने वर्षों का समय

इतनी यादें

और इतने प्रश्न खड़े थे।


मैं मुस्कुरा दिया।


मन ने धीरे से कहा—


“प्रेम

शायद यही है।”


कोई व्यक्ति

सामने न हो

फिर भी

उसका नाम

मन की हवा में

हल्की-सी खुशबू छोड़ जाए।


मैंने

अब भी

कोई निर्णय नहीं लिया।


बस

स्क्रीन को देखते हुए

सोचता रहा—


क्या प्रेम

मिलन में होता है?


या

सिर्फ़ स्मृति में?


कमरे में

शाम की रोशनी

धीरे-धीरे उतरने लगी थी।


मेज़

अब भी शांत थी।


कलम

अब भी

काग़ज़ के पास पड़ी थी।


और मैं

स्क्रीन पर चमकते

उस एक नाम को देखते हुए


सोच रहा था—


शायद

आज का अगला अध्याय


प्रेम का होगा।


मुकेश ,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment