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Thursday, 12 March 2026

अध्याय – 07 : मेज़, कलम और काग़ज़

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 07 : मेज़, कलम और काग़ज़


सुबह की चाय

धीरे-धीरे

अपने ताप से उतर रही थी।


खिड़की से आती हवा

अब कमरे की आदत बन चुकी थी।


चाय का पैन

रसोई में

अपनी अगली भूमिका का इंतज़ार कर रहा था।


और मैं

मेज़ के सामने बैठा था।


यह वही मेज़ थी

जिस पर वर्षों से

किताबें खुलती रहीं

काग़ज़ भरते रहे

और विचार

कभी आते रहे

कभी चले जाते रहे।


मैंने

अपनी कलम उठाई।


कुछ क्षण

उसे हाथ में घुमाया।


फिर

सामने रखे सफ़ेद काग़ज़ को देखा।


अजीब बात है—


काग़ज़ हमेशा

इतना शांत क्यों होता है?


जैसे उसे पता हो

कि अभी

इस पर

कुछ जन्म लेने वाला है।


मैंने कलम को

मेज़ पर रखा।


और अचानक

मुझे लगा—


मेज़

धीरे-धीरे

कुछ कह रही है।


उसकी आवाज़

बहुत धीमी थी।


जैसे

किसी पुराने वृक्ष की स्मृति बोल रही हो।


मेज़ बोली—


“मैं स्थिर हूँ।”


“वर्षों से

यहीं खड़ी हूँ।”


“लोग आते हैं

बैठते हैं

लिखते हैं

और चले जाते हैं।”


वह थोड़ी देर रुकी।


फिर बोली—


“पर विचार

मेरे ऊपर ही जन्म लेते हैं।”


मैं

ध्यान से सुन रहा था।


तभी

कलम ने

हल्की-सी आवाज़ में कहा—


“जन्म लेते हैं?”


“या

बस गुजरते हैं?”


मेज़ ने पूछा—


“तुम क्या कहना चाहती हो?”


कलम बोली—


“मैं बहती हूँ।”


“जब तक स्याही चलती है

विचार

शब्द बनते रहते हैं।”


“पर क्या वे

सचमुच लेखक के होते हैं?”


कमरे में

एक गहरा मौन उतर आया।


काग़ज़

अब भी

सफेद पड़ा था।


फिर

काग़ज़ ने

बहुत शांत स्वर में कहा—


“मैं स्मृति हूँ।”


दोनों

उसकी ओर देखने लगे।


काग़ज़ बोला—


“जो कुछ भी

यहाँ लिखा जाता है

वह

कुछ देर बाद

लेखक से भी अलग हो जाता है।”


मैं

थोड़ा चौंका।


काग़ज़ आगे बोला—


“लिखने वाला सोचता है

विचार उसके हैं।”


“पर जैसे ही

शब्द काग़ज़ पर उतरते हैं

वे

सबके हो जाते हैं।”


कमरे में

रोशनी थोड़ी और गहरी हो गई।


मुझे अचानक

एक पुराना प्रश्न याद आया—


क्या विचार

मनुष्य के भीतर जन्म लेते हैं?


या

मनुष्य

सिर्फ़ उनका रास्ता होता है?


मैंने

कलम उठाई।


काग़ज़ पर

एक बिंदु बनाया।


फिर रुक गया।


मेज़

अब भी शांत थी।


कलम

मेरी उँगलियों में

धीरे-धीरे हिल रही थी।


और काग़ज़

अब भी

अपने धैर्य में स्थिर था।


मुझे लगा—


शायद लेखक

किसी नदी का स्रोत नहीं होता।


वह

सिर्फ़ एक घाट होता है।


जहाँ

विचार की नदी

कुछ देर के लिए ठहरती है।


फिर

शब्द बनकर

आगे बह जाती है।


मैंने

पहला वाक्य लिखा।


स्याही

धीरे-धीरे

काग़ज़ पर उतरने लगी।


और उसी क्षण

मुझे महसूस हुआ—


शायद

सबसे सच्चा लेखक वही होता है


जो यह मान ले


कि वह

विचारों का मालिक नहीं


सिर्फ़ उनका माध्यम है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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