लघु उपन्यास – दूसरा खंड
अध्याय – 06 : खिड़की, हवा और सुबह की रोशनी
सुबह
धीरे-धीरे
कमरे में उतर रही थी।
रात की खामोशी
अब हल्की हो रही थी।
चाय का कप
तश्तरी पर रखा था।
चम्मच
उसके पास
थोड़ी थकान में पड़ी थी।
मैंने खिड़की की ओर देखा।
वह
पूरी रात
चुपचाप खड़ी रही थी।
कमरे की सारी बातें
सुनती हुई।
पैन की भाप
कप की गर्माहट
और
चम्मच की खनखनाहट।
पर उसने
अब तक
कुछ नहीं कहा था।
आज
पहली बार
मुझे लगा
खिड़की भी
कुछ कहना चाहती है।
मैं धीरे-धीरे
उसके पास गया।
बाहर
आसमान का रंग
नीले से सुनहरे में बदल रहा था।
सूरज
अभी पूरी तरह उगा नहीं था।
बस
उसकी रोशनी
हवा के साथ
कमरे में दाख़िल हो रही थी।
तभी
एक हल्की हवा आई।
परदे
धीरे-धीरे हिले।
और मुझे लगा
खिड़की
हवा से बात कर रही है।
खिड़की ने
धीरे से पूछा—
“तुम हर सुबह
इतनी दूर से आती हो?”
हवा
मुस्कुराई।
“मैं कहीं से नहीं आती
मैं तो बस
चलती रहती हूँ।”
खिड़की ने कहा—
“मैं तो बस
यहीं खड़ी रहती हूँ।”
हवा बोली—
“फिर भी
दुनिया तुमसे होकर
अंदर जाती है।”
खिड़की
कुछ देर चुप रही।
फिर बोली—
“पर मैं
दुनिया का सिर्फ़ एक हिस्सा दिखा पाती हूँ।”
हवा
हल्के से हँसी।
“दुनिया
कभी किसी चौखट में नहीं समाती।”
कमरे में
रोशनी थोड़ी और बढ़ गई।
मेज़
अब साफ़ दिख रही थी।
किताबें
धीरे-धीरे जाग रही थीं।
मैंने सोचा—
शायद
मनुष्य भी
खिड़की जैसा ही होता है।
हम सोचते हैं
हम पूरी दुनिया देख रहे हैं।
पर सच में
हम सिर्फ़
एक छोटा-सा हिस्सा देख पाते हैं।
हवा
अब भी
खिड़की से आती-जाती रही।
और रोशनी
धीरे-धीरे
कमरे के हर कोने में फैल गई।
मुझे लगा—
यह कमरा
अब पहले जैसा नहीं रहा।
अब यह
थोड़ा बड़ा हो गया है।
क्योंकि
इसके भीतर
बाहर की दुनिया
आने लगी है।
मैंने
खिड़की की चौखट को छुआ।
लकड़ी
ठंडी थी।
पर उस पर
सुबह की रोशनी
गरम हो रही थी।
अचानक
मेरे भीतर
कुछ पंक्तियाँ बनने लगीं।
मैंने मेज़ से
काग़ज़ उठाया।
और
खिड़की को देखते हुए
धीरे-धीरे लिखने लगा—
खिड़की पर एक सूफ़ियाना शोधात्मक नज़्म
खिड़की
सिर्फ़ दीवार में
काटी हुई जगह नहीं होती
वह
घर और ब्रह्मांड के बीच
एक छोटा-सा समझौता होती है
जहाँ
भीतर का मौन
और बाहर की हवा
धीरे-धीरे
एक-दूसरे को समझते हैं
खिड़की
सिर्फ़ रोशनी नहीं लाती
वह
यह भी बताती है
कि रोशनी
हमारी नहीं होती
वह कहीं दूर
सूरज में जन्म लेती है
और
हमारी आँखों तक पहुँचने से पहले
अनगिनत यात्राएँ करती है
खिड़की
यह भी सिखाती है—
कि हर चौखट
सीमा नहीं होती
कुछ चौखटें
दरअसल
दुनिया का पहला निमंत्रण होती हैं
और शायद
मनुष्य का मन भी
एक खिड़की ही है
जिससे
कभी-कभी
ब्रह्मांड
चुपचाप
अंदर आ जाता है।
मैंने
काग़ज़ को मेज़ पर रख दिया।
कमरा अब
पूरी तरह रोशनी से भर चुका था।
हवा
अब भी
खिड़की से आती-जाती रही।
मैं कुछ क्षण
चुप खड़ा रहा।
फिर
मुस्कुराकर
रसोई की ओर चला गया।
क्योंकि
ऐसी सुबह में
एक नई चाय
फिर से बननी चाहिए।
मैंने
गैस जलाई।
और
चाय का पैन
फिर से चढ़ा दिया।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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