लघु उपन्यास
भाग – 11 : चादर और कपड़ों की शिकायत
आज बिस्तर झाड़ते हुए याद आया—
चादर धोए काफ़ी दिन हो गए।
शायद
जब वो आयी थी
उसके एक दिन पहले धोई थी।
सोचा—
चलो आज चादर बदल लें।
तो चादर ने
धीरे से फुसफुसा कर कहा—
“बदलोगे कैसे?
दूसरी वाली तो पहले से ही
गंदी पड़ी है।
और तुम्हारे पास
मेरे और उस जोड़े वाली चादर के अलावा
तीसरी चादर है ही कहाँ?”
मैं थोड़ा चुप हो गया।
वह जैसे
मेरी चुप्पी पढ़कर
और बोलने लगी—
“याद है?
घर से आते वक़्त
माता जी ने ही
हमें तह करके
तुम्हारे बैग में रख दिया था।
तब से
कितने साल हो गए।
हमें ही बिछाते हो,
हमें ही धोते हो,
और कभी-कभी
हमें ही ओढ़ कर सो भी जाते हो।”
फिर उसने
थोड़ी थकी हुई आवाज़ में कहा—
“अब तो हम
काफ़ी ज़र्जर हो चुके हैं।
बताओ…
हमें रिटायर कब करोगे?”
मैं अभी
उसकी बातों से उबर भी नहीं पाया था कि
खूंटी पर टँगी जींस
हवा के झोंके से
हल्की-हल्की हिलने लगी।
और उसने भी
अपनी शिकायत शुरू कर दी—
“मेरी कब सुध लोगे?
माना
जींस कम धोने से भी काम चल जाता है,
पर मुझे तो तुमने
लगभग दो महीने से
पानी का मुँह ही नहीं दिखाया है।”
फिर थोड़ी नाराज़गी से बोली—
“और पिछली बार
अगर बारिश में न भीगे होते,
और कीचड़ से मैं गंदी न हुई होती
तो शायद
धुलती भी नहीं।”
मैं
जींस की शिकायत सुन ही रहा था कि
कमीज़ भी
अपना रोना लेकर बैठ गई।
वह बोली—
“मेरे बटन देखे हैं?
एक आधा टूट चुका है।
और कॉलर का हाल देखो—
इतनी बार पसीना झेला है
कि अब तो
मेरी भी इज़्ज़त रख लो।”
तभी
अंडरवियर और बनियान
भी पीछे क्यों रहते।
वे तो
काफ़ी देर से
चीख-चीख कर
बदले जाने की गुहार लगा रहे थे।
इन सबके बीच
घर में पहनने वाला लोअर
कहीं चुपचाप पड़ा था।
उसकी आवाज़
जाने क्यों
सबकी शिकायतों के नीचे
दब गई थी।
मैं
बहुत देर तक
तख़्त पर बैठा
सोचता रहा—
क्या करूँ
क्या न करूँ।
फिर अचानक
एक फैसला किया।
घर भर के कपड़ों का
एक बड़ा-सा गट्ठर बनाया
और
वाशिंग मशीन के मुँह में
ठूँस दिया।
प्लग ऑन कर दिया।
वाशिंग मशीन
जैसे इस फैसले से
बहुत खुश हो गई।
उसकी मोटर
खुशी-खुशी
घूमने लगी।
घुर्र…
घुर्र…
घुर्र…
जैसे
किसी मेले में
कोई पुराना झूला
फिर से चल पड़ा हो।
और मेरे हाथ की सिगरेट का धुआँ
धीरे-धीरे
नाचता हुआ
खिड़की के बाहर जा रहा था।
मैं
खिड़की के पास खड़ा था।
और अचानक
मुझे लगा—
मेरे कमरे की
हर चीज़
मुझसे
कुछ न कुछ
कहती रहती है।
बस
फर्क़ इतना है कि
कभी मैं
सुन लेता हूँ,
और कभी
सिगरेट के धुएँ के साथ
उनकी बातें भी
खिड़की के बाहर
उड़ जाती हैं।
— मुकेश
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