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Tuesday, 10 March 2026

भाग – 10 : दूधिया बच्चू लाल

लघु उपन्यास

भाग – 10 : दूधिया बच्चू लाल


दोपहर

धीरे-धीरे आँगन में उतर आई है।


सूरज अब

सिर के ठीक ऊपर है

जैसे किसी चौकस चौकीदार की तरह

हर चीज़ को ध्यान से देख रहा हो।


मैं अभी भी

अपने कमरे में हूँ।


खिचड़ी का कुकर

सुबह ही शांत हो गया था।


रसोई में

उसकी हल्की-सी खुशबू

अब भी बची हुई है।


ऐश-ट्रे

फिर आधी भर चुकी है।


और मैं

तख़्त पर बैठा

एक अधूरी सोच में उलझा हूँ।


तभी

सीढ़ियों पर

धीमे-धीमे कदमों की आवाज़ आती है।


मैं पहचान जाता हूँ—


बच्चू लाल।


उसकी चाल

धीमी और संकोची होती है।


जैसे हर कदम से पहले

वह सोचता हो

कि आगे बढ़ना चाहिए या नहीं।


दरवाज़े पर

हल्की-सी खटखटाहट होती है।


मैं दरवाज़ा खोलता हूँ।


बच्चू लाल

सामने खड़ा है।


हाथ में

पीतल का छोटा-सा माप

और दूध की खाली बाल्टी।


उसके कपड़ों से

गौशाला की हल्की-सी गंध आती है

जिसमें

घास, मिट्टी और दूध

तीनों की मिली-जुली महक है।


वह हल्का-सा मुस्कुराता है।


फिर धीरे से कहता है


“भाई जी…

एक बात कहनी थी।”


मैं पहले से जानता हूँ

कौन-सी बात।


मैं सिर हिलाता हूँ

“कहो बच्चू।”


वह थोड़ा झिझकता है।


फिर सिर खुजलाते हुए बोलता है


“वो…

दूध का थोड़ा हिसाब था।”


मैं हँस देता हूँ।


“थोड़ा?”


वह भी मुस्कुरा देता है


“अच्छा…

थोड़ा ज़्यादा।”


हम दोनों

कुछ पल चुप रहते हैं।


फिर वह धीरे से कहता है


“कोई जल्दी नहीं है…

बस सोचा याद दिला दूँ।”


मैं सिगरेट की डिब्बी उठाता हूँ।


उसमें अब भी

दो सिगरेट बची हैं।


एक निकालकर

उसकी तरफ़ बढ़ाता हूँ।


वह पहले मना करता है


“नहीं भाई जी…”


फिर

ले लेता है।


हम दोनों

दरवाज़े के पास खड़े

सिगरेट पीने लगते हैं।


धुआँ

दोपहर की धूप में

धीरे-धीरे घुल जाता है।


कुछ देर बाद

बच्चू लाल बोलता है


“गाय भी अजीब होती है।”


मैं पूछता हूँ


“कैसे?”


वह कहता है—


“अगर रोज़

एक ही समय पर दूह दो

तो खुश रहती है।


एक दिन देर हो जाए

तो नाराज़ हो जाती है।”


मैं हँस देता हूँ।


फिर पूछता हूँ


“और आदमी?”


वह थोड़ा सोचता है।


फिर कहता है


“आदमी…

शायद उल्टा होता है।


उसे रोज़

कुछ न कुछ देर से ही समझ में आता है।”


उसकी यह बात

अचानक

मुझे बहुत गहरी लगती है।


वह सिगरेट का आख़िरी कश लेकर

नीचे फेंक देता है।


फिर कहता है


“ठीक है भाई जी…

मैं चलता हूँ।


जब हो जाए

दे देना।”


मैं सिर हिला देता हूँ।


वह सीढ़ियाँ उतरने लगता है।


उसकी बाल्टी

धीरे-धीरे सीढ़ियों से टकराती हुई

आवाज़ करती है।


मैं दरवाज़े पर खड़ा

उसे जाते हुए देखता हूँ।


फिर कमरे में लौट आता हूँ।


ऐश-ट्रे

मुझे देखती है।


झाड़ू

अब भी तख़्त के नीचे है।


और मकड़ी

अपने जाल को

और थोड़ा बड़ा कर चुकी है।


मैं सोचता हूँ


इस शहर में

कितने लोग हैं

जो बिना हिसाब के

थोड़ा-सा भरोसा दे देते हैं।


मकान-मालिक।


बच्चू लाल।


और शायद

मैं भी।


मैं तख़्त पर बैठ जाता हूँ।


सिगरेट की आख़िरी डिब्बी

हाथ में घुमाते हुए।


और सोचता हूँ—


शाम होने तक

इस कमरे में


शायद

एक और कहानी

पैदा हो जाएगी।


 मुकेश,,,,,

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