लघु उपन्यास
भाग – 9 : सुबह, दूधिया और खाली डिब्बी
बाहर
सूरज न जाने कितनी देर पहले उग चुका है।
मुर्गा
बहुत पहले बाँग दे चुका है।
अब वह
अपने ही गौरव से बाहर निकलकर
आँगन में चहल-कदमी कर रहा है।
दाना चुग रहा है
जैसे किसी राजा ने
सुबह की सभा समाप्त करके
थोड़ी देर टहलने का निश्चय किया हो।
उसके सिर की कलँगी
फर्र-फर्र हिल रही है।
गर्दन
अकड़ी हुई है।
कुछ मुर्गियाँ
इधर-उधर फुदक रही हैं
जैसे राज्य की छोटी-छोटी प्रजाएँ
अपने-अपने काम में लगी हों।
कासिम
अपने मुर्गी-बाड़े को देख कर
खुश हो रहा होगा।
सुबह की धूप में
पंखों की चमक
उसे शायद
किसी छोटी-सी समृद्धि का अहसास देती होगी।
उधर
दूधिया बच्चू लाल के बाड़े में
गाय रम्भा चुकी होगी।
बच्चू
शायद दूध दुह चुका होगा।
बछड़ा
अब छूँछे थनों को
धीरे-धीरे चूस रहा होगा।
गाय
थान में मुँह मार रही होगी
और पूँछ से
मक्खियाँ उड़ा रही होगी।
बच्चू लाल
गौशाला साफ़ करके
अब लकड़ी की छोटी मेज़ पर
दूध का हिसाब लिख रहा होगा।
अचानक
उसे याद आया होगा
मेरा कई महीनों का दूध का पैसा बाकी है।
वह मन ही मन सोच रहा होगा
“आज फिर कहना पड़ेगा।”
पर बच्चू लाल
ज़्यादा सख़्त आदमी नहीं है।
वह तगादा करने से पहले
दो बार सोचता है।
शायद
इस बार भी सोचेगा
“चलो
आज पूछ ही लेते हैं।”
और मैं
फिलहाल
अपने लिहाफ़ में लेटा हूँ।
लिहाफ़
अब भी रात की गर्मी समेटे हुए है।
मैं
नए बहाने की तलाश में हूँ।
तभी
सिरहाने रखी
सिगरेट की डिब्बी उठाता हूँ।
डिब्बी
हल्की लगती है।
मैं खोलकर देखता हूँ
खाली।
एकदम खाली।
गुस्से में
उसे दरवाज़े की तरफ़ फेंक देता हूँ।
डिब्बी
पट्ट की आवाज़ के साथ
दरवाज़े के किनारे जाकर लेट जाती है।
तख़्त के नीचे पड़ी
झाड़ू
उसे शांत भाव से देखती है।
जैसे किसी बुज़ुर्ग ने
एक नादान बच्चे की हरकत देख ली हो।
वह कुछ नहीं कहती।
बस
वैसी ही पड़ी रहती है।
और मैं—
लिहाफ़ में
आधा उठकर सोच रहा हूँ
फिलहाल सिगरेट लेने जाऊँ
या बिना सिगरेट के कश के
हाज़त के लिए जाऊँ।
यह भी
जीवन का एक अजीब दर्शन है
कभी-कभी
आदमी की सबसे बड़ी समस्या
सिर्फ़ यही होती है
कि पहले क्या किया जाए।
सिगरेट।
या
सुबह।
मैं कुछ देर
यही सोचता रहता हूँ।
बाहर
मुर्गे की दूसरी आवाज़ आती है।
गाय फिर
हल्की-सी रम्भाती है।
और बच्चू लाल
शायद अब
मेरे घर की तरफ़ देखने लगा होगा।
चलो खैर
आगे का किस्सा
दोपहर में।
मुकेश,,,,,,,,,,,,,,,
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