लघु उपन्यास – दूसरा खंड
अध्याय – 11 : वह छोटा-सा बटन
रात
धीरे-धीरे
कमरे में उतर आई थी।
मेज़ पर रखी
लैम्प की हल्की रोशनी
काग़ज़ों पर गिर रही थी।
खिड़की
अब भी आधी खुली थी।
हवा
कभी आती
कभी रुक जाती।
और मेज़ पर
लैपटॉप
चुपचाप बंद पड़ा था।
मैं कुर्सी पर
थोड़ा पीछे टिककर बैठा था।
मन में
अजीब-सी हलचल थी।
जैसे
किसी शांत झील के भीतर
अचानक
हल्की लहर उठ आई हो।
मैंने
लैपटॉप की ओर देखा।
फिर
धीरे से
उसे फिर खोल दिया।
स्क्रीन
फिर से रोशन हुई।
कुछ क्षण बाद
वही पेज खुला—
और
वही नाम।
अब भी
वहीं।
अब भी
शांत।
अब भी
जैसे
मेरा इंतज़ार करता हुआ।
मैंने
धीरे-धीरे
उसकी प्रोफ़ाइल फिर खोली।
कुछ तस्वीरें
और देखीं।
एक तस्वीर
किसी पुराने पुस्तकालय की थी।
उसने नीचे लिखा था—
“कुछ जगहें
सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं होतीं
बल्कि
अपने आप को
थोड़ा समझने के लिए होती हैं।”
मैंने
वह पंक्ति
दो बार पढ़ी।
फिर
एक अजीब-सी मुस्कान
मेरे चेहरे पर आ गई।
क्योंकि
आज ही
मैंने भी
कुछ ऐसा ही सोचा था।
क्या सचमुच
कुछ लोग
दूर रहते हुए भी
एक जैसी चीज़ें सोचते हैं?
या
यह सिर्फ़ मेरा भ्रम है?
कमरे में
घड़ी ने
धीरे से
नौ बजाए।
उसकी आवाज़
कमरे में
थोड़ी देर तक गूँजती रही।
मैंने
फिर
मुकेश ,,,,,
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