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Thursday, 12 March 2026

अध्याय – 12 : एक छोटी-सी हिम्मत

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 12 : एक छोटी-सी हिम्मत


रात

अब पूरी तरह

कमरे में उतर आई थी।


मेज़ पर रखी

लैम्प की पीली रोशनी

काग़ज़ों के किनारों को

हल्का-हल्का चमका रही थी।


खिड़की

अब भी आधी खुली थी।


हवा

धीरे-धीरे

अंदर आ रही थी।


और मेज़ पर

लैपटॉप

फिर से खुला हुआ था।


स्क्रीन पर

वही पेज।


वही नाम।


और उसके ठीक सामने

वह छोटा-सा बटन—


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मैं

कुर्सी पर बैठा

उसे देख रहा था।


अजीब बात है—


जीवन के बड़े निर्णय

कभी-कभी

इतने छोटे रूप में आते हैं।


मैंने

धीरे से साँस ली।


और अचानक

मन के भीतर

एक विचार उठा—


अगर इस क्षण

मैं सिर्फ़

साक्षी भाव में रहूँ

तो क्या होगा?


मैंने

आँखें बंद कर लीं।


कुछ क्षण तक

सिर्फ़ अपनी साँस सुनता रहा।


कमरे की हवा

धीरे-धीरे

फेफड़ों में जाती

फिर बाहर आती।


विचार

उठते

फिर शांत हो जाते।


उसी शांत क्षण में

मुझे लगा—


शायद

यही वह स्थिति है

जिसे ध्यान में

तुरीय की हल्की छाया कहा जाता है।


जहाँ

मन पूरी तरह खाली नहीं होता

पर उससे

एक दूरी बन जाती है।


जैसे

कोई नदी बह रही हो

और हम

किनारे पर खड़े

उसे देख रहे हों।


मैंने

अपने भीतर उठते

दो भाव देखे—


पहला

संकोच।


दूसरा

एक हल्की-सी खुशी।


मैंने

दोनों को देखा।


पर इस बार

उनमें उलझा नहीं।


सिर्फ़

देखता रहा।


तभी

मन के भीतर

एक और प्रश्न उठा—


प्रेम क्या है?


क्या प्रेम

किसी व्यक्ति को पाने की इच्छा है?


या

सिर्फ़

उसकी उपस्थिति से

मन का शांत हो जाना?


मैंने सोचा—


शायद प्रेम

किसी को पकड़ लेने की चीज़ नहीं है।


शायद प्रेम

एक प्रकार की उपस्थिति है।


जैसे

हवा।


वह

किसी की नहीं होती

पर

सबको छूती है।


मैंने

आँखें खोलीं।


स्क्रीन

अब भी सामने थी।


उसका नाम

अब भी

वहीं था।


और उस नाम को देखकर

मन में जो हल्की-सी रोशनी उठती थी

वह भी

अब भी थी।


पर इस बार

उसमें

घबराहट कम थी।


मैंने

माउस उठाया।


कर्सर

धीरे-धीरे

बटन की ओर बढ़ा।


कुछ क्षण

वहीं रुका।


फिर

बहुत शांत भाव से


मैंने

क्लिक कर दिया।


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बस।


इतना ही।


कोई शोर नहीं हुआ।


कमरे में

कुछ भी नहीं बदला।


खिड़की से

अब भी वही हवा आ रही थी।


लैम्प

अब भी

उसी तरह जल रहा था।


पर मेरे भीतर

कुछ हल्का-सा बदल गया था।


जैसे

किसी नदी में

एक छोटा-सा पत्थर गिरा हो

और उसकी लहरें

धीरे-धीरे

फैल रही हों।


मैं कुर्सी से उठा।


खिड़की के पास गया।


बाहर

रात का आकाश

बहुत शांत था।


तारे

धीरे-धीरे चमक रहे थे।


मैंने सोचा—


शायद प्रेम

कभी-कभी

सिर्फ़ इतना ही होता है—


एक छोटी-सी हिम्मत।


और

एक शांत प्रतीक्षा।


मैं

कुछ देर

आसमान को देखता रहा।

फिर

मुस्कुराकर

लैपटॉप बंद कर दिया।

क्योंकि

अब कहानी का अगला अध्याय

शायद

मेरे नहीं


मुकेश ,,,,,,,,

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